Thursday, 12 September 2019

भाई ये किताब जल्दी पढ़ो

यह किताब एक पत्रकार के नोट्स से बनी है.  जिसमें बहुत सारे किस्से हैं. और कहीं ना कहीं यह पता चल जाता है कि लेखक को अपने कॉलेजों में से एक जेएनयू से कितना प्यार है. और होना भी चाहिए. लेखक जहां जहां गया वहां वहां उसने कुछ लिखा है.

आपको भी यह किताब नॉस्टैलजिया से भर देगी. और मंद मुस्कान आपको ज्यादातर किस्सों में देगी, बाकी में आपको सोचने को मजबूर कर देगी.

व्यक्तिगत तौर पर कहूँ, मतलब मेरी राय तो है भाई जल्दी पढ़ो. बहुत मजा आ रहा है. छोटी छोटी चीज है जो हम और किताबों में शायद मिस करते हैं, यहां मिल रही है. दुकानों के किस्से हैं. मूवीज के किस्से हैं. और हां, सबसे जरूरी बीच बीच में कविताएँ. (साभार इंस्टाग्राम)

Monday, 4 February 2019

बेखुदी में खोया शहर

लोकार्पण की तस्वीर
मोहन जोशी: लेखक-पत्रकार अरविंद दास की अनुज्ञा बुक्स से प्रकाशित पुस्तक बेख़ुदी में खोया शहर: एक पत्रकार के नोट्स का मशहूर पत्रकार करण थापर ने आईआईसीदिल्ली में विमोचन किया.

इस कार्यक्रम में वरिष्ठ आलोचक वीर भारत तलवार और राजस्थान पत्रिका के सलाहकार संपादक ओम थानवी भी शामिल थे. कार्यक्रम का संचालन हिंदी के लेखक प्रभात रंजन ने किया.

तलवार ने कहा कि मीडिया के डॉमिनेंट डिसकोर्स में जिसकी बात नहीं की जाती है इस किताब में उस पर बात की गई है। उन्होंने लेखक की दलितों-पिछड़ोंसबाल्टर्न के प्रति संवेदनशील दृष्टि की बात की। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के संदर्भ में जब बात होती है तब अक्सर राष्ट्रीय आंदोलन के दौर की पत्रकारिता की चर्चा होती है ,जब एक लक्ष्य और उदेश्य को लेकर देश में पत्रकारिता की जाती थी. आजकल अधिकतर टीवी चैनल और अखबार घुटने टेक चुके हैं और बहुत कम हैं जो अभी भी प्रतिरोध में खड़े हैं। लेकिन इन नकारात्मकता के बीच जो सकारात्मक पक्ष भी उभर रहा हैउस पर ध्यान देने की जरूरत है। ऐसे ही सकारात्मकता अरविंद दास की पत्रकारिता में दिखाई देती है। यहाँ पत्रकारिता और साहित्य का अदभुत संगम है.

तलवार ने कहा कि हिंदी में शेखर जोशी ने मर्म को छूने वाली कहानियाँ लिखी हैं. पर कहानी के अंत में ऐसी जगह दृष्टि जाती है जिसकी कल्पना पहले पाठक ने नहीं की थी. वह पाठकों के दिल को छूती है. इस किताब में शामिल लेख उसी परंपरा में जुड़ते हैं.

किताब के लेखों से उदाहरण देते हुए उन्होंने शंघाई की यात्रा का हवाला देते हुए कहा कि लेखक महानगर की चर्चा तो करता ही है पर उसकी दृष्टि शंघाई से दूर गाँवों और कृषक समाज पर भी गई है. इसी तरह मिथिला पेंटिंग में आई आधुनिताजिसमें भ्रूण हत्या से लेकर गुजरात के दंगों का चित्रण हैकी इस किताब में चर्चा है. तलवार ने कहा कि पूरी दुनिया में मिथिला पेंटिंग की प्रदर्शनियाँ लगती है पर दरभंगा-मधुबनी जिले में एक भी कलादीर्घा नहीं है लेखक की नजर इस बात पर गई है.

अपने वक्तव्य में तलवार ने स्वतंत्रता आंदोलन के सेनानी और आइडिया ऑफ इंडिया’ के पैरोकार पीर मुहम्मद मूनिस का जिक्र किया. उन्होंन कहा कि लेखक इस बात का ठीक ही उल्लेख करता है कि महात्मा गाँधी मूनिस का जिक्र करने से चूक गएपर वे मूनिस के यहाँ आते-जाते थे और खाना खाते थे. तलवार ने खास तौर से जेएनयू के ऊपर एक लेख का जिक्र करते हुए कहा कि इतना अच्छा लेख उन्होंने कहीं नहीं पढ़ा. इस लेख में जेएनयू के इतिहासचरित्रवातावरणउपलब्धियों और वर्तमान संकट का यथार्थपरक तस्वीर खींची गई है. उन्होंने एक लेख के हवाले से मैथिली भाषा में ब्राह्मणों के वर्चस्व और दलितों-शूद्रों की अनुपस्थिति का उल्लेख किया. तलवार ने कहा कि मैथिली भाषा का आंदोलन ब्राह्मणओं के नेतृत्व में ब्राह्मणों का आंदोलन रहा है और इसलिए सफल नहीं हो सका. 

 कार्यक्रम में ओम थानवी ने कहा कि उदारीकरण-भूमंडलीकरण के दौर में पत्रकारिता पर बाहर से तो बहुत अंगुलियां उठ रही हैंलेकिन जब पत्रकारिता के भीतर से ही सवाल उठते हैं तो वह महत्वपूर्ण होता है। यह काम इस किताब में किया है। अरविंद के पास साहित्यकार की भाषा और संवेदनशीलता है। शोधार्थी होने के बावजूद शोध का बोझ नहीं है। किताब साहित्य के करीब हैभाषा आनंद देती है। 
उन्होंने कहा कि अरविंद की यात्रा में ज्ञान नहीं हैअनुभव है और स्पंदन है। 

कार्यक्रम का संलाचन करते हुए प्रभात रंजन ने संकलित लेखों में साहित्यिकता पर जोर दिया। उन्होंने संस्मरणों में मौजूद लालित्य को रेखांकित किया.
 .
(हंस, फरवरी 2019 में संपादित अंश प्रकाशित)

Sunday, 6 January 2019

बेख़ुदी में खोया शहर : अलग-अलग ज़ायके के कुछ टुकड़े जो स्वाद तो देते हैं पर पेट नहीं भरते


गायत्री आर्य, सत्याग्रह 
पुस्तक के अध्याय मगध की शांतिका एक अंश 

मेरे गांवों की सड़क जो अधपकी बीच में ही बनकर रह गई थी, वह पिछले 20 सालों से वैसी ही है. बिजली कभी-कभी अतिथि-सा आ जाती है. प्राथमिक स्कूल में मास्टर साहब बच्चों को हांकते रहते हैं. इन्हें देखकर नागार्जुन के दुःखरन मास्टरकी याद ताजा हो जाती है...पूरे इलाक़े के लिए एक खस्ताहाल अस्पताल है, जिसमें किसी गर्भवती महिला या मरीज के लिए खून देने की भी व्यवस्था नहीं है...

बिहार में जब तक शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्था नहीं सुधरेगी तब तक विकास की कोई भी बात बेमानी है. लेकिन जैसा कि मगधकविता-संग्रह की एक कविता में श्रीकांत वर्मा ने लिखा है : कोई छींकता तक नहीं/इस डर से/कि मगध की शांति भंग ना हो जाए/मगध को बनाए रखना है, तो/मगध में शांति रहनी ही चाहिए.

ऐसा लगता है चुनावी महापर्व में वर्षों बाद बिहार में आई शांति को मीडिया अपने सवालों से भंग नहीं करना चाहता.

पुस्तक : बेखुदी में खोया शहर
लेखक : अरविंद दास
प्रकाशक : अनुज्ञा बुक्स प्रकाशन
कीमत : 375 रुपए

हममें से हर एक व्यक्ति एक साथ कई स्तरों पर जीता है. एक स्थाई और बाहरी जीवन है जिसका तरीका, व्यस्तता, जिम्मेदारियां, जोखिम और तनाव सभी कुछ पूर्व-निर्धारित तरीके से आगे बढ़ता रहता है. दिल, दिमाग, देह, सभी के सहयोग और परस्पर संयोजन से काम होता जाता है. लेकिन साथ ही एक ऐसा भीतरी जीवन भी होता है जो सिर्फ दिल और दिमाग के स्तर पर अनवरत चलता जाता है. जिसे कोई देखता नहीं. जो तमाम व्यस्तताओं और जिम्मेदारियों के बीच जब-तब, घड़ी-घड़ी हमारे जेहन में सिर्फ भावना के स्तर पर जीया जाता है.

हर एक व्यक्ति इस अदृश्य, अनियोजित जीवन को टुकड़ों में जीता है, लेकिन उसकी कहीं शिनाख्त नहीं होती. अरविंद दास की यह किताब दिमाग में अनवरत आने वाले ऐसे ही असंख्य ख्यालों में से कुछ को दर्ज करती है. किताब के नोट्सनुमा लेख पाठकों को अपने साथ मिथिला के गांवों से लेकर, देश के कई बड़े महानगरों से होते हुए लंदन, पेरिस, वियना और शंघाई तक के सफर पर ले जाते हैं.
अपने सभी लेखों में अरविन्द कवियों, लेखकों, चित्रकारों, संस्कृतिकर्मियों, लोक-कलाकारों को जब-तब शिद्दत से याद करते हैं. इस कारण इन नोट्स में देसीपन का स्वाद है. यहां अपनी जड़ों से जुड़ाव है और उन मजबूत जड़ों का हिस्सा होने का गौरव भी है. लेखक की भाषा और लहजा कहीं एक पत्रकार वाला है तो कहीं साहित्यिक भी हो जाता है. फ्रांस की सेन नदी के तट पर केदारनाथ अग्रवाल की कविता की एक पंक्ति को याद करते हुए लेखक रूमानी होकर लिखता है -

नदी एक नौजवान ढीठ लड़की है’...केदारनाथ अग्रवाल ने ऐसा लिखा है. शायद केन नदी के बारे में. यदि वे केन के बारे में ऐसा नहीं लिखते, तो मैं सेन के बारे में यह कहता...सेन ढीठ है. वह आपका रास्ता नहीं छोड़ती.

वह आपसे लिपटना चाहती है. लिपटती है. वह आपको चूमना चाहती है. चूमती है. आप उसके कोमल और नरम हाथों की गरमाहट महसूस करते हैं.

कल-कल करती हुई वह बात-बेबात हंसती है. और जब आप उससे नाराज़ होने का अभिनय करते हैं, वह और हंसती चली जाती है.

गांव की जड़ों से जुड़े जितने भी लोग महानगरों में रहते हैं, एक स्तर पर उनकी पीड़ा मिलती है. वे सभी लोग अपने मां-बाप के जीवित रहने तक उनके पास गांव में लंबे समय तक न रह सकने और शहर में उन्हें अपने पास न रख पाने की टीस से गुजरते हैं. यह टीस ज्यादातर शहरी बच्चों के दिलों में अक्सर ही हूक बनकर उठती है. ऐसी बहुत सी चीजें हैं जो तरक्की की रेस में पीछे छूट गए अपने माता-पिता के साथ हम देर तक, टिककर, ठहरकर करना चाहते हैं. लेकिन जिंदगी की आपाधापी उन चीजों को शिद्दत से करने का मौका बहुत कम देती है. थोड़े से समय में ज्यादा से ज्यादा जी लेने की भूख के ऐसे ही कुछ भावुक पलों को बांटते हुए लेखक कहता है -

क्या खाना है, कहां जाना है, किस-किस से मिलना है कि सूची में यह भी लिखके आया था कि पापा से बहस नहीं करनी है, मां से वो सब पूछना है कि जो बातें फोन पर नहीं कर पाता, दादी से आज़ादी के दिनों और निपट ग़रीबी की बात करनी है. साल-भर बाद घर आया कि मैं अपने ही घर में चार दिन का मेहमान भर हूं. कल फिर दिल्ली की ट्रेन पकड़नी है...दिल्ली का मानसून कितना भी सुंदर क्यों नहीं हो, पर उसमें वो ताजगी कहां, जिसमें सोंधी मिट्टी की गंध और अधपके फलों और फूलों की ख़ुशबू लिपटी रहती है.

महानगरों में मानसून अक्सर ही आपदा बनकर आता है. क्या यह कहने का साहस लेखक इसलिए नहीं कर सका, कि फिर कहीं गांव के सौंधे मानसून के बिछड़ने की टीस और गहरा न जाए?

दादी-बाबा, नानी-नाना के साथ बातें करना अक्सर ही इतिहास के पन्ने पलटने जैसा होता है. वह इतिहास जो किताबों में दर्ज नहीं हुआ. जिसे कहीं लिखा नहीं गया, लेकिन जो फिर भी अपने पढ़ने का इंतजार करता है. लेकिन अक्सर ही स्मृतियों में दर्ज वह इतिहास अनदेखा, अनपढ़ा ही रह जाता है, क्योंकि आज की पीढ़ी इतिहास और अतीत के किस्सों का जीवंत वर्णन सुनने से ज्यादा गूगल से मिली जानकारी को पढ़ना पसंद करती है. लेखक अपनी दादी (दाय) के ज्ञान, परख और अनुभव को बांटते हुए हमें बताता है -

दाय के पास कोई औपचारिक शिक्षा नहीं थी...लोक अनुभव का ऐसा संसार उसके पास था जहां शास्त्रीय ज्ञान बौना पड़ जाता है!...दाय घड़ी देखकर समय का हिसाब नहीं लगाती. सूर्य को देखकर कहती- एक पहर बीता, दो पहर बीता. अपने जन्म का हिसाब वो 1934 में बिहार में आए भीषण भूकंप से लगाती...

दादी कहती, उस जमाने में गांव में कही-कहीं चूल्हा जलता था, पर लोग मिल-बांटकर खाते थे. जब भी हम उससे आज की ग़रीबी की बात करते तो वह कहती नहीं, पहले जैसी स्थिति नहीं है. अब सब घर में चूल्हा तो जलता है. औपनिवेशिक दौर में पली-बढ़ी उस पीढ़ी के लिए भूखसबसे बड़ा सच था.

पता नहीं लेखक अपनी दादी को क्यों नहीं बता सका कि औपनिवेशिक दौर बीत जाने के बाद वैश्वीकरण के इस दौर में भूखपहले से ज्यादा विकरालरूप में चारों तरफ फैल गई है.

इस किताब के नोट्सनुमा लेखों को लेखक की डायरी भी कहा जाए तो संभवतः कुछ गलत नहीं होगा. किताब के सभी नोट्स पांच भागों में बंटे हैं. एक खंड में देश-विदेश की यात्राएं, दूसरे में समकालीन मीडिया, तीसरे में कला-संस्कृति, चौथे में रिपोर्ताज और पांचवें व अंतिम खंड में संस्मरण हैं. कुछ नोट्स पढ़कर पाठक काफी भावविभोर से हो जाएंगे, तो कुछ को पढ़ना किसी अनचाहे संवाद का हिस्सा बनने जैसा लगेगा. हां, लेकिन ज्यादातर नोट्स जानकारी के स्वास्थ्यवर्धक डोज से भरे हैं. सहज भाषा में लिखे गए इन लेखों को पढ़ना अलग-अलग स्वाद की छोटी-छोटी मीठी गोलियों को चूसने जैसा सा लगता है जो झट से खत्म हो जाती हैं...और यदि कोई गोली पसंद न आए तो झट से दूसरी को फांककर जायका बदला जा सकता है.

(सत्याग्रह वेबसाइट पर प्रकाशित, 6 जनवरी 2019)

Thursday, 3 January 2019

अनुभव के स्पंदन से रचे नोट्स

युगवार्ता, 6 जनवरी 2019


मनोज मोहन: अरविंद दास एक संवेदनशील पत्रकार हैं। बेखुदी में खोया शहर: एक पत्रकार के नोट्सउनकी पहली किताब है। इसे बेहद सुरुचि के साथ अनुज्ञा बुक्स ने प्रकाशित किया है। इस किताब में दर्ज हैं समाज, प्रकृति, लोकरंग, कला-साहित्य और यात्राओं आदि में जीवन के स्पंदन जिन्हें वे अपनी जीवन यात्रा में खोजते रहे। वे कहते हैं, मेरे लिए लेख, टिप्पणी और ब्लॉग लिखने का उद्देश्य कम शब्दों में व्यक्त करना, एक चित्र खींचना और एक सवाल उठाना है। लेख पठनीय और रोचक हो, इस बात का मैंने हमेशा ख्याल रखा है। किताब में पांच खंड हैं, जो लेखक की देश-विदेश की यात्राओं, मीडिया, कला-संस्कृति, रिपोर्ताज और संस्मरण को समेटे हुए है।

खंडों के शीर्षक परदेश में बारिश, राष्ट्र सारा देखता है, संस्कृति के अपरूप रंग, उम्मीद-ए-शहर और स्मृतियों के कोलाज बनाए गए हैं। परदेश में बारिश खंड में अधिकतर लेख देश-विदेश की यात्राओं को लेकर है। पहले ही लेख शंघाई का समाजवादमें चीन के वर्तमान विरोधाभास को वे उजागर करते हैं। गगनचुंबी इमारतें, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के ब्रांडेड शोरूम और सड़क पर लंबी कारों की एक स्वप्निल दुनिया है, तो दूसरी तरफ समाजवादी चीन के साथ संतुलित तालमेल मिलाना मुश्किल हो जाता है।

एक पत्रकार का साहित्य संस्कारित मन कैसे अतीत और भविष्य देखता है, उसकी एक बानगी सपनों का समंदरशीर्षक लेख के अंतिम पंक्तियों में देखने को मिलता है। शहर की सड़कों पर शांति भले दिखे पर समंदर की लहरों में शोर है। मेरी खिड़की से भी समंदर झांक रहा है। लहरों की झंझावात और चीख मुझे सुनाई दे रही है’- ये पंक्तियां लेखक ने 2012 में लिखी थी, और आज 2018 में श्रीलंका में चल रहे राजनीतिक हलचल शुभ संकेत नहीं देते। अरविन्द कलाओं की नगरी वियना पहुंचते हैं, तो वे कहते हैं वियना में आप स्ट्रीट पर किसी अदाकारा से टकरा सकते हैं। मेट्रो में किसी संगीतकार से गुतगू कर सकते हैं। सड़क पार करते हुए जेब्रा क्रॉसिंगपर किसी पेंटर से मिल सकते हैं।

संस्कृति के अपरूप एक महत्वपूर्ण खंड है जिसके पहले ही लेख में वे बिहार राज्य के मिथिला क्षेत्र की सांस्कृतिक संपन्नता का जिक्र करते हैं। दरभंगा शैली ध्रुपद के एक अन्य प्रसिद्ध घराने डागर शैली से भिन्न है। हालांकि पाकिस्तान स्थित तलवंडी घराने से दरभंगा घराने की निकटता है। यह एक उदाहरण है कि राष्ट्र की सीमा भले ही एकदूसरे को अलगाती है, पर संगीत एक-दूसरे को जोड़ता रहा है। वहीं मिथिला के दरभंगा और मधुबनी जिले में मिथिला पेंटिंग जीवनयापन और लोक से कैसे गहरे से जुड़ी हुई है, इसका भी जिक्र कोहबर रचती औरतें शीर्षक लेख में वे करते हैं। युवाओं की रुचि भारतीय शास्त्रीय संगीत में कैसे बढ़े, और इसके प्रचार-प्रसार में स्पिक मैके के योगदान के बारे में कहते हैं सही मायनों में हमारे लिए शास्त्रीय संगीत का द्वार स्पिक मैके ने ही खोला है। इस किताब में पत्रकारिता और साहित्य का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

एक समय था जब अखबारों और पत्रिकाओं के संपादक अपने समय के बड़े साहित्यकार हुआ करते थे। अज्ञेय, रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती, मनोहर श्याम जोशी आदि इस परंपरा के धवल पक्ष हैं। वहीं वर्तमान दौर में मीडिया की स्थिति पर अरविंद अपनी टिप्पणी दर्ज करते हैं, वर्तमान में मीडिया पेशेवर नैतिकता की दरकार किसी भी अन्य पेशे से ज्यादा है। दुर्भाग्यवश भारत में मीडिया के अभूतपूर्व फैलाव के बाद जो मीडिया संस्कृति विकसित हुई है उसमें अभी भी पत्रकारों के शिक्षण-प्रशिक्षण पर विशेष जोर नहीं है। फलत: कई बार पत्रकार राजनीतिक पार्टियों के पैरोकार बन जाते हैं और उनके एजेंडे को ही मीडिया का एजेंडा मान लेते हैं।

अरविंद दास पत्रकारिता में आने से पहले शोधार्थी रहे हैं, पर इस वृत्ति का बोझ उनके लेखन में नहीं है। और इस कारण किताब का साहित्यिक मूल्य बढ़ जाता है। उनके द्वारा की गई यात्रा में सिर्फ ज्ञान नहीं है, अनुभव और स्पंदन भी है। हालांकि उनके कई लेखों में विस्तार की गुजांइश थी, पर अखबार के लिखे गए इन लेखों की एक सीमा हमेशा रहती है। लेखक की संवेदनशीलता, चीजों को देखने की बारीक दृष्टि और सहज भाषा के कारण यह एक उल्लेखनीय किताब है।

Tuesday, 1 January 2019

पत्रकार के नोट्स: एक दस्तावेज

नया ज्ञानोदय, जनवरी 2019
युवा पत्रकार अरविंद दास की हालिया प्रकाशित पुस्तक 'बेख़ुदी में खोया शहर' में पत्रकार बनने की प्रक्रिया और शोध के दौरान लगभग 15 वर्षों के अनुभवों का विस्तृत संसार जानने-समझने को मिलता है. संस्मरणों की यह पुस्तक पाँच खंडों में विभक्त है. अरविंद की पुस्तक पढ़ते हुए यूरोप जैसे सजीव हो उठता है. संस्कृति, देशकाल और समसामयिक मुद्दों से लबरेज ये नोट्स व्यक्तिगत न होकर पाठकों के बीच एक दस्तावेज के रूप में विद्यमान रहेंगे.