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Thursday, 22 November 2018

एक संवेदनशील पत्रकार के अनूठे अनुभव: बेख़ुदी में खोया शहर

ओम थानवी, जनसत्ता के पूर्व संपादक
ओम थानवी के फेसबुक वॉल से:  जनसत्ता में छब्बीस बरस काम करते हुए शायद कभी सोचा नहीं कि इसमें कितनी चीज़ें बची रह जाएंगी। जो बचा रह जाएगा, उसके शायद और रूप भी हों। आदरणीय प्रभाष जोशी, अच्युतानंद मिश्र, राहुल देव वाला सामर्थ्य मुझमें न था, फिर भी देख कर ख़ुशी होती है कि कोई दो दर्जन किताबें सामने आई हैं, जिनकी सामग्री जनसत्ता में छपी। अशोक वाजपेयी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, कृष्ण कुमार, के बिक्रम सिंह, प्रभाकर श्रोत्रिय, प्रयाग शुक्ल, पद्मा सचदेव, सुधीर चंद्र, मधु कांकरिया, प्रेमपाल शर्मा से लेकर पंकज पराशर और सीरज सक्सेना जैसे युवतर लेखकों की किताबें इनमें शामिल हैं।

इसी कड़ी में कल अरविंद दास की किताब मिली है - बेख़ुदी में खोया शहर (अनुज्ञा बुक्स)। जनसत्ता में ये लेख सम्पादकीय और रविवारी पन्नों पर छपे। एक संवेदनशील पत्रकार के अनूठे अनुभव इस किताब में दर्ज़ हैं। समाज, प्रकृति, लोकरंग, कला-साहित्य और यात्राओं आदि में जीवन का स्पंदन वे खोजते हैं। महसूस करते हैं। बड़ी सहजता के साथ बयान करते हैं।

लेखन लेखकों का। पर उसकी प्रस्तुति में मंगलेश डबराल, प्रियदर्शन (बाद में एनडीटीवी में), अशोक शास्त्री (अब विदा), सूर्यनाथ सिंह, राजेन्द्र राजन, प्रमोद द्विवेदी, रामजन्म पाठक, अरविंद शेष, अमर छाबड़ा जैसे सहकर्मियों की भूमिका भी अहम रही। अख़बारों के मौजूदा हाल को देखते संपादन में वैसी टीम का जुटना अब शायद आसान न हो।