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युगवार्ता, 6 जनवरी 2019 |
मनोज मोहन: अरविंद दास एक संवेदनशील पत्रकार हैं। ‘बेखुदी में खोया शहर: एक पत्रकार के नोट्स’ उनकी पहली किताब है। इसे बेहद सुरुचि के साथ
अनुज्ञा बुक्स ने प्रकाशित किया है। इस किताब में दर्ज हैं समाज, प्रकृति, लोकरंग, कला-साहित्य और
यात्राओं आदि में जीवन के स्पंदन जिन्हें वे अपनी जीवन यात्रा में खोजते रहे। वे
कहते हैं, मेरे लिए लेख, टिप्पणी और ब्लॉग लिखने का उद्देश्य कम शब्दों
में व्यक्त करना, एक चित्र खींचना
और एक सवाल उठाना है। लेख पठनीय और रोचक हो, इस बात का मैंने हमेशा ख्याल रखा है। किताब में पांच खंड
हैं, जो लेखक की देश-विदेश की
यात्राओं, मीडिया, कला-संस्कृति, रिपोर्ताज और संस्मरण को समेटे हुए है।
खंडों के शीर्षक परदेश में बारिश, राष्ट्र सारा देखता है, संस्कृति के
अपरूप रंग, उम्मीद-ए-शहर और
स्मृतियों के कोलाज बनाए गए हैं। परदेश में बारिश खंड में अधिकतर लेख देश-विदेश की
यात्राओं को लेकर है। पहले ही लेख ‘शंघाई का समाजवाद’
में चीन के वर्तमान विरोधाभास को वे उजागर करते
हैं। गगनचुंबी इमारतें, बहुराष्ट्रीय
कंपनियों के ब्रांडेड शोरूम और सड़क पर लंबी कारों की एक स्वप्निल दुनिया है,
तो दूसरी तरफ समाजवादी चीन के साथ संतुलित
तालमेल मिलाना मुश्किल हो जाता है।
एक पत्रकार का साहित्य संस्कारित मन कैसे अतीत और भविष्य देखता है, उसकी एक बानगी ‘सपनों का समंदर’ शीर्षक लेख के अंतिम पंक्तियों में देखने को मिलता है। ‘शहर की सड़कों पर शांति भले दिखे पर समंदर की लहरों में शोर
है। मेरी खिड़की से भी समंदर झांक रहा है। लहरों की झंझावात और चीख मुझे सुनाई दे
रही है’- ये पंक्तियां लेखक ने 2012
में लिखी थी, और आज 2018 में श्रीलंका में
चल रहे राजनीतिक हलचल शुभ संकेत नहीं देते। अरविन्द कलाओं की नगरी वियना पहुंचते
हैं, तो वे कहते हैं वियना में
आप स्ट्रीट पर किसी अदाकारा से टकरा सकते हैं। मेट्रो में किसी संगीतकार से गुतगू
कर सकते हैं। सड़क पार करते हुए ‘जेब्रा क्रॉसिंग’
पर किसी पेंटर से मिल सकते हैं।
संस्कृति के अपरूप एक महत्वपूर्ण खंड है जिसके पहले ही लेख में वे बिहार राज्य
के मिथिला क्षेत्र की सांस्कृतिक संपन्नता का जिक्र करते हैं। ‘दरभंगा शैली ध्रुपद के एक अन्य प्रसिद्ध घराने
डागर शैली से भिन्न है। हालांकि पाकिस्तान स्थित तलवंडी घराने से दरभंगा घराने की
निकटता है। यह एक उदाहरण है कि राष्ट्र की सीमा भले ही एकदूसरे को अलगाती है,
पर संगीत एक-दूसरे को जोड़ता रहा है। वहीं
मिथिला के दरभंगा और मधुबनी जिले में मिथिला पेंटिंग जीवनयापन और लोक से कैसे गहरे
से जुड़ी हुई है, इसका भी जिक्र
कोहबर रचती औरतें शीर्षक लेख में वे करते हैं। युवाओं की रुचि भारतीय शास्त्रीय
संगीत में कैसे बढ़े, और इसके
प्रचार-प्रसार में स्पिक मैके के योगदान के बारे में कहते हैं सही मायनों में
हमारे लिए शास्त्रीय संगीत का द्वार स्पिक मैके ने ही खोला है। इस किताब में
पत्रकारिता और साहित्य का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
एक समय था जब अखबारों और पत्रिकाओं के संपादक अपने समय के बड़े साहित्यकार हुआ
करते थे। अज्ञेय, रघुवीर सहाय,
धर्मवीर भारती, मनोहर श्याम जोशी आदि इस परंपरा के धवल पक्ष हैं। वहीं
वर्तमान दौर में मीडिया की स्थिति पर अरविंद अपनी टिप्पणी दर्ज करते हैं, वर्तमान में मीडिया पेशेवर नैतिकता की दरकार
किसी भी अन्य पेशे से ज्यादा है। दुर्भाग्यवश भारत में मीडिया के अभूतपूर्व फैलाव
के बाद जो मीडिया संस्कृति विकसित हुई है उसमें अभी भी पत्रकारों के
शिक्षण-प्रशिक्षण पर विशेष जोर नहीं है। फलत: कई बार पत्रकार राजनीतिक पार्टियों
के पैरोकार बन जाते हैं और उनके एजेंडे को ही मीडिया का एजेंडा मान लेते हैं।
अरविंद दास पत्रकारिता में आने से पहले शोधार्थी रहे हैं, पर इस वृत्ति का बोझ उनके लेखन में नहीं है। और
इस कारण किताब का साहित्यिक मूल्य बढ़ जाता है। उनके द्वारा की गई यात्रा में
सिर्फ ज्ञान नहीं है, अनुभव और स्पंदन
भी है। हालांकि उनके कई लेखों में विस्तार की गुजांइश थी, पर अखबार के लिखे गए इन लेखों की एक सीमा हमेशा रहती है।
लेखक की संवेदनशीलता, चीजों को देखने
की बारीक दृष्टि और सहज भाषा के कारण यह एक उल्लेखनीय किताब है।


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