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Monday, 4 February 2019

बेखुदी में खोया शहर

लोकार्पण की तस्वीर
मोहन जोशी: लेखक-पत्रकार अरविंद दास की अनुज्ञा बुक्स से प्रकाशित पुस्तक बेख़ुदी में खोया शहर: एक पत्रकार के नोट्स का मशहूर पत्रकार करण थापर ने आईआईसीदिल्ली में विमोचन किया.

इस कार्यक्रम में वरिष्ठ आलोचक वीर भारत तलवार और राजस्थान पत्रिका के सलाहकार संपादक ओम थानवी भी शामिल थे. कार्यक्रम का संचालन हिंदी के लेखक प्रभात रंजन ने किया.

तलवार ने कहा कि मीडिया के डॉमिनेंट डिसकोर्स में जिसकी बात नहीं की जाती है इस किताब में उस पर बात की गई है। उन्होंने लेखक की दलितों-पिछड़ोंसबाल्टर्न के प्रति संवेदनशील दृष्टि की बात की। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के संदर्भ में जब बात होती है तब अक्सर राष्ट्रीय आंदोलन के दौर की पत्रकारिता की चर्चा होती है ,जब एक लक्ष्य और उदेश्य को लेकर देश में पत्रकारिता की जाती थी. आजकल अधिकतर टीवी चैनल और अखबार घुटने टेक चुके हैं और बहुत कम हैं जो अभी भी प्रतिरोध में खड़े हैं। लेकिन इन नकारात्मकता के बीच जो सकारात्मक पक्ष भी उभर रहा हैउस पर ध्यान देने की जरूरत है। ऐसे ही सकारात्मकता अरविंद दास की पत्रकारिता में दिखाई देती है। यहाँ पत्रकारिता और साहित्य का अदभुत संगम है.

तलवार ने कहा कि हिंदी में शेखर जोशी ने मर्म को छूने वाली कहानियाँ लिखी हैं. पर कहानी के अंत में ऐसी जगह दृष्टि जाती है जिसकी कल्पना पहले पाठक ने नहीं की थी. वह पाठकों के दिल को छूती है. इस किताब में शामिल लेख उसी परंपरा में जुड़ते हैं.

किताब के लेखों से उदाहरण देते हुए उन्होंने शंघाई की यात्रा का हवाला देते हुए कहा कि लेखक महानगर की चर्चा तो करता ही है पर उसकी दृष्टि शंघाई से दूर गाँवों और कृषक समाज पर भी गई है. इसी तरह मिथिला पेंटिंग में आई आधुनिताजिसमें भ्रूण हत्या से लेकर गुजरात के दंगों का चित्रण हैकी इस किताब में चर्चा है. तलवार ने कहा कि पूरी दुनिया में मिथिला पेंटिंग की प्रदर्शनियाँ लगती है पर दरभंगा-मधुबनी जिले में एक भी कलादीर्घा नहीं है लेखक की नजर इस बात पर गई है.

अपने वक्तव्य में तलवार ने स्वतंत्रता आंदोलन के सेनानी और आइडिया ऑफ इंडिया’ के पैरोकार पीर मुहम्मद मूनिस का जिक्र किया. उन्होंन कहा कि लेखक इस बात का ठीक ही उल्लेख करता है कि महात्मा गाँधी मूनिस का जिक्र करने से चूक गएपर वे मूनिस के यहाँ आते-जाते थे और खाना खाते थे. तलवार ने खास तौर से जेएनयू के ऊपर एक लेख का जिक्र करते हुए कहा कि इतना अच्छा लेख उन्होंने कहीं नहीं पढ़ा. इस लेख में जेएनयू के इतिहासचरित्रवातावरणउपलब्धियों और वर्तमान संकट का यथार्थपरक तस्वीर खींची गई है. उन्होंने एक लेख के हवाले से मैथिली भाषा में ब्राह्मणों के वर्चस्व और दलितों-शूद्रों की अनुपस्थिति का उल्लेख किया. तलवार ने कहा कि मैथिली भाषा का आंदोलन ब्राह्मणओं के नेतृत्व में ब्राह्मणों का आंदोलन रहा है और इसलिए सफल नहीं हो सका. 

 कार्यक्रम में ओम थानवी ने कहा कि उदारीकरण-भूमंडलीकरण के दौर में पत्रकारिता पर बाहर से तो बहुत अंगुलियां उठ रही हैंलेकिन जब पत्रकारिता के भीतर से ही सवाल उठते हैं तो वह महत्वपूर्ण होता है। यह काम इस किताब में किया है। अरविंद के पास साहित्यकार की भाषा और संवेदनशीलता है। शोधार्थी होने के बावजूद शोध का बोझ नहीं है। किताब साहित्य के करीब हैभाषा आनंद देती है। 
उन्होंने कहा कि अरविंद की यात्रा में ज्ञान नहीं हैअनुभव है और स्पंदन है। 

कार्यक्रम का संलाचन करते हुए प्रभात रंजन ने संकलित लेखों में साहित्यिकता पर जोर दिया। उन्होंने संस्मरणों में मौजूद लालित्य को रेखांकित किया.
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(हंस, फरवरी 2019 में संपादित अंश प्रकाशित)

Thursday, 20 December 2018

बेख़ुदी में खोया शहर का लोकार्पण

राजस्थान पत्रिका, 21 दिसंबर 2018
इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में बुधवार को पत्रकार और लेखक अरविंद दास की किताब बेख़ुदी में खोया शहर: एक पत्रकार के नोट्सका लोकार्पण हुआ। दरअसल, घुमक्कड़ पत्रकार अरविंद ने अपनी यात्राओं और अनुभवों के नोट्स को किताब का आकार दिया है। अनुज्ञा बुक्स ने इस किताब को प्रकाशित किया है। मशहूर टीवी पत्रकार करण थापर, वरिष्ठ आलोचक वीर भारत तलवार और राजस्थान पत्रिका के सलाहकार संपादक ओम थानवी ने इस किताब का विमोचन किया। कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध लेखक प्रभात रंजन ने किया।

इस मौके पर ओम थानवी ने कहा कि आज मीडिया सरकार की गोद में झूल गया है। सरकार से तरह-तरह के सहयोग लेकर ही संस्थान और पत्रकार मुग्ध हैं। ऐसे दौर में पत्रकारिता पर बाहर से तो बहुत अंगुलियां उठ रही हैं, लेकिन जब पत्रकारिता के भीतर से ही सवाल उठते हैं तो वह महत्वपूर्ण होता है। यह काम अरविंद दास ने किया है।

उन्होंने कहा कि पत्रकारिता जल्दबाजी में लिखा गया साहित्य है। यह किताब भी अखबारों के लिए लिखे गए लेखों का संग्रह है। लेकिन ऐसी किताबों को सिर्फ पत्रकारिता का सामान समझ कर किनारे नहीं रख देना चाहिए। इसमें साहित्यकार की भाषा और संवेदनशीलता है। अच्छी बात यह है कि लंबे समय तक एक शोधार्थी रहने के बावजूद शोध का बोझ इनके लेखन में नहीं है। यह साहित्य के करीब है। इनकी भाषा आनंद देती है।

किताब के यात्रा वृतांत का उल्लेख करते उन्होंने कहा, ‘देखने और घूमने की जिज्ञासा हम सब में होती है। भारतीय मन तो जैसे घूमने के लिए ही पैदा हुआ है। तीर्थयात्राओं से लेकर विवाह और पर्व आदि तक यात्राओं से जुड़े हैं। ये यात्राएं आपके लिए जगहों का और जीवन का उद्घाटन करती हैं। अरविंद ने इन यात्राओं के दौरान बहुत बारीक नजर से चीजों को देखा और अंकित किया है। जिस तरह ये बरबस केदारनाथ, नागार्जुन, टैगोर आदि साहित्यकारों का ख्याल ले आते हैं, आप इनके साहित्यकार मन की दाद दिए बगैर नहीं रह सकते।

वहीं, वरिष्ठ आलोचक प्रोफेसर वीर भारत तलवार ने कहा कि मीडिया के डॉमिनेंट डिसकोर्स में जिसकी बात नहीं की जाती है इस किताब में उस पर बात की गई है। उन्होंने लेखक की दलितों-पिछड़ों, सबाल्टर्न के प्रति संवेदनशील दृष्टि की बात की। किताब में मिथिला पेंटिंग, बीबीसी और पीर मुहम्मद मुनिस के ऊपर लेखों का जिक्र किया गया है। साथ ही इन लेखों की तुलना शेखर जोशी की कहानियों से की गई है। उन्होंने कहा कि इस किताब में पत्रकारिता और साहित्य का अदभुत संगम है। जेएनयू में प्रोफेसर रहे वीर भारत तलवार ने किताब में शामिल एक लेख का जिक्र करते हुए कहा कि जेएनयू पर इतना मुक्कमल लेख उन्होंने कहीं और नहीं पढ़ा।

उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के संदर्भ में अक्सर स्वतंत्रता आंदोलन की पत्रकारिता की चर्चा होती है और आज के दौर की पत्रकारिता से उसकी तुलना होती है। आज किस तरह अधिकतर टीवी चैनल और अखबार घुटने टेक चुके हैं और बहुत कम हैं, जो अभी भी प्रतिरोध में खड़े हैं। लेकिन इन नकारात्मकता के बीच जो सकारात्मक पक्ष भी उभर रहा है, उस पर ध्यान देने की जरूरत है। ऐसे ही सकारात्मकता दिखाई देती है अरविंद की पत्रकारिता में। उसके लिखे में पत्रकारिता और साहित्य का अद्भुत संगम दिखाई देता है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि अखबार के लिए लिखे गए इन लेखों को किताब के रूप में लाते हुए और विस्तार दिया जा सकता था।


इस मौके पर विकास नारायण राय, गोविंद प्रसाद, डॉक्टर वीनित भार्गव, डॉक्टर बलराम अग्रवाल सहित अकादमिक, साहित्य और पत्रकारिता जगत के कई लोग मौजूद थे। अरविंद ने इससे पहले 'हिंदी में समाचार’ (शोध) किताब लिखी है। साथ ही रिलिजन, पॉलिटिक्स एंड मीडिया: जर्मन एंड इंडियन पर्सपेक्टिव्सकिताब के संयुक्त संपादक रहे हैं। वह बीबीसी के दिल्ली स्थित ब्यूरो में सलाहकार और स्टार न्यूज़ में मल्टीमीडिया कंटेंट एडिटर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से करेंट अफेयर्स कार्यक्रम बनाने वाली प्रतिष्ठित प्रोडक्शन कंपनी, आईटीवी (करण थापर), नई दिल्ली के साथ सलाहकार के रूप में जुड़े हैं। इसके अलावा वह विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, ऑनलाइन पोर्टल के लिए नियमित लेखन में जुटे हुए हैं। 


(समाचार 4 मीडिया से साभार)