सुशांत झा, पत्रकार, इंडिया टुडे ग्रुप: अरविंद दास की किताब ‘बेखुदी में खोया
शहर-एक पत्रकार के नोट्स्’ एक ही साथ यात्रा
वृतांत भी है, रिपोर्ताज भी है
और संपादकीय पन्नों पर छपने वाले लेख जैसा भी कुछ है. इसमें इक्कीसवीं सदी के
दोनों दशक हैं जिसमें बर्लिन और लंदन भी है और मिथिला के सुदूर गांव भी. यह किताब
लेखक के छोटे-छोटे लेखों का एक समुच्चय है जिसे पढ़ने के बाद लगता है कि इसकी कमी
ये है कि काश इसे थोड़ा और विस्तार में बताया जाता! लेखक चीजों को छूते हुए निकल
गए हैं- और शायद ऐसी किताबों की नियति यही होती है जो लेखों के समुच्चय के रूप में
छपती है.
हालांकि किताब के शीर्षक में ही इसका संकेत है कि ये ‘एक पत्रकार के नोट्स्’ हैं, ऐसे में शिकायत
गाढ़ी नहीं होनी चाहिए. लेकिन एक बात तय है कि यह किताब उन लोगों को दिलचस्प लगेगी
जिनकी रुचि कला, साहित्य, मीडिया, सिनेमा और यात्रा-वर्णनों में है. लघु आलेखों के रूप में
लिखे जाने से एक फायदा ये है कि शब्दों का चयन और खर्च बहुत हिसाब से किया गया है.
सिनेमा या साहित्य की बातें बोझिल या उबाऊ नहीं लगतीं और शायद यह प्रशिक्षण लेखक
के पत्रकार होने की वजह से भी है.
किताब में विश्वविद्यालयों का वर्णन, यूरोप-चीन की यात्रा, सिनेमा और देसी
शास्त्रीय कलाओं से लेखक का प्रेम इस किताब को 360 डिग्री का बना देता है. जैसा का लेखक ने खुद लिखा है कि ‘कमला-बलान के आंगन में पलने वाला’ व्यक्ति जाहिर है नदियों से प्यार करना सीख
जाता है. इस किताब में टेम्स, सेन इत्यादि
नदियों का जिक्र किसी पुरानी प्रेमिका की चर्चा करने जैसा लगता है.
कई आलेखों को पढ़ते हुए लगता है कि अरविंद के लेखन पर निर्मल वर्मा की हल्की
सी छाया है. एक लेख में निर्मल वर्मा और शिमला पर भी है और हिंदी की त्रासदी भी!
जिस शिमला को निर्मल वर्मा के लिए भी जाना जाता है वहां निर्मल की किताबें क्यों
नहीं मिलती? दुकानदार कहता है,
‘क्योंकि हिंदी की किताबें बिकती कहां हैं’?
पूरी किताब से लेखक का उदारवादी दृष्टिकोण झलकता है. जाहिर है, वे वाम के मीठे आलोचक भी हैं लेकिन भाजपा और
संघ परिवार के सबसे ज्यादा.
नाम लेकर हिंदुत्ववादी राजनीति की साहसिक आलोचना की गई है, हालांकि कांग्रेस की नीतियों पर लगभग सायास या
अनायास चुप्पी है. जबकि किताब में उस दौर का भी वर्णन है जब देश में दस साल तक
कांग्रेस का शासन था!
इस किताब में जेएनयू, मिथिला और
एफटीआइआइ (पुणे) बार-बार आता है. जाहिर है लेखक के वहां से रिश्ते रहे हैं. जेएनयू
क्या है और उसकी लगभग वाम वर्चस्व वाली राजनीति का स्वरूप क्या है, इसका बढ़िया विश्लेषण किया गया है. अच्छी बात
ये है कि वो एक निरपेक्ष विश्लेषण है.
‘जर्द पत्तों का वन’ नाम के आलेख में
कश्मीर में आतंकवाद और भारतीय सेना की तैनाती पर विचार किया गया है और उसे सिर्फ
कश्मीर के लोगों के नजरिए से देखने की कोशिश की गई है.
शायद यह लघु आलेख या किस्सागोई के बीच भटक रहे किसी लेखन की एक सीमा हो जिसमें
कई बार आप पीड़ित के पक्ष में भावुकतापूर्ण लेखन कर मुद्दों की संपूर्णता को नहीं
समझ पाते!
कश्मीरी पंडितों का दर्द, घाटी की आबादी का
मजहबीकरण और एक देश के रूप में भारत की अखंडता के प्रश्न को सायास या अनायास
नजरअंदाज कर दिया गया है. उसी तरह से ‘राष्ट्रवादी विमर्श बरास्ते मीडिया’ नामके अध्याय में बुरहान वानी को ‘चरमपंथी’ लिखा गया है. इस
शब्द का इस्तेमाल कई विदेशी मीडिया हाउस भी घाटी के आतंकवादियों के लिए करते हैं.
शंघाई का समाजवाद इसी विषय पर संभवत: मनोहर श्याम जोशी के एक लेख की याद
दिलाता है. हालांकि जोशीजी का लेख विस्तृत था. लेकिन हिंदी में किसी युवा लेखक ने
चीन और शंघाई के बारे में इस तरह से लिखा है, वो भी कम सुकूनदेह नहीं है.
यह पुस्तक मिथिला की संस्कृति को समझने के लिए बहुत उपयोगी है. इसमें करीब आधा
दर्जन ऐसे आलेख हैं. सिक्की कला, मिथिला पेंटिंग,
मैथिला भाषा में दलित-पिछड़ों का लगभग
गैर-मौजूदगी महत्वपूर्ण लेख हैं और भविष्य के लेखकों के लिए शोध सामग्री भी.
आपत्तियां अपनी जगह, इस किताब को
इसलिए भी पढ़ना चाहिए क्योंकि आप ऐसे-ऐसे लेखकों, किताबों, फिल्मों, नाटकों और कला के रूपों से परिचित होते हैं जो
अन्यथा किसी नौजवान के लिए बीसियों साल का महंगा निवेश हो सकता है.
(इंडिया टुडे वेबसाइट पर प्रकाशित)

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