Thursday, 20 December 2018

बेख़ुदी में खोया शहर: दिलचस्प एवँ पठनीय

प्रभात, सुधीर, करण थापर, अरविंद, वीर भारत तलवार, ओम थानवी

शुभनीत कौशिक, युवा इतिहासकार, व्याख्याता: पत्रकार अरविंद दास की हाल ही में प्रकाशित किताब बेख़ुदी में खोया शहरपिछले पंद्रह वर्षों में उनके द्वारा लिखे गए लेखों, टिप्पणियों का संकलन है। इन छोटे पर सधे हुए लेखों में से कुछ दुनिया के नामचीन शहरों के बारे में हैं, तो कुछ मीडिया के बदलते हुए परिवेश, कला-संस्कृति के विविध पक्षों के बारे में। कुछ लेख संस्मरणात्मक हैं, तो कुछ रिपोर्ताज की शैली में। ख़ुद अरविंद अपने इन लेखों के बारे में लिखते हैं कि मेरे लिए लेख-टिप्पणी-ब्लॉग लिखने का उद्देश्य छोटे-छोटे वाक्यों में, सहज और कम शब्दों में एक विचार व्यक्त करना, एक चित्र खींचना और एक सवाल उठाना रहा है।

शहरों के बारे में लिखे अरविंद के लेख दिलचस्प और पठनीय हैं। यहाँ शहरों के साथ नदी भी हमजोली की तरह मौजूद है। वह चाहे हाइडेलबर्ग और नेकर हों, या लंदन और टेम्स या फिर पेरिस और सेन। बक़ौल अरविंद, ‘यूरोप की नदियाँ शहरों से इस कदर गूँथी हुई हैं कि आप उसे शहर की संस्कृति से अलगा नहीं सकते।यहाँ तक कि सेन नदी तो अरविंद को ढीठभी जान पड़ती है, ‘जो कल-कल करती हुई बेबात हँसती रहती है।दिवंगत चित्रकार और लेखक अमृतलाल वेगड़ अपनी अप्रतिम कृति सौंदर्य की नदी नर्मदामें नर्मदा के बारे में कुछ ऐसा ही विचार रखते हैं।

टेम्स नदी के किनारे सालाना आयोजित होने वाले जलसे में भाग लेते हुए और टेम्स के प्रति अपना हक़ अदा करते लंदनवासियों को देख अरविंद को भारतीय नदियों की याद हो आती है। और फिर यह सवाल कि हमने अपने नदियों को देवी-देवता मानकर उन्हें पूज्य बना दिया पर प्यार और सम्मान देना कहाँ सीखा!

बतौर पत्रकार, अरविंद पिछले एक दशक में मीडिया के चरित्र में आते बदलाव पर भी अपनी राय बेबाकी से रखते हैं। उनका मानना है कि आज के दौर में कई बार पत्रकार राजनीतिक पार्टियों के पैरोकार बन जाते हैं और उनके एजेंडे को ही मीडिया का एजेंडा मान लेते हैं।अरविंद मीडिया के साथ-साथ सिनेमा और हिंदुस्तानी संगीत के बारे में भी गहराई से लिखते हैं। फिल्मी जुनून के किस्सेहिंदुस्तानी सिनेमा के कुछ अनछुए पहलुओं से हमें रू-ब-रू कराते हैं। वह चाहे मणि कौल और कमल स्वरूप के सिनेमा पर लिखी टिप्पणियाँ हों या एफ़टीआईआई के मार्फत ऋत्विक घटक के योगदान पर लिखे लेख।

इन लेखों में कहीं दरभंगा घराने और विंध्यावासिनी देवी के संगीत की चर्चा है, तो कहीं मिथिला पेंटिंग और कोहबर की बात करते महासुन्दरी देवी, गंगा देवी, सीता देवी, जगदंबा देवी को भी बड़ी ही शिद्दत के साथ याद किया गया है। विद्यापति इन लेखों में आपको जगह-जगह मिलेंगे और अपने बहुरंगी तेवरों में मैथिल समाज भी। एक लेख राजस्थान के अनूठे गाँव तिलोनिया की यात्रा और बंकर रॉय के योगदान बारे में भी है, जिसे पढ़ते हुए मुझे बरसों पहले पढ़ा हुआ भीष्म साहनी का वह लेख याद हो आया, जिसका शीर्षक ही था राजस्थान के एक गाँव की तीर्थ-यात्रा

तिब्बत पर लिखे लेख में अरविंद जहां तिब्बती समुदाय के निर्वासन की त्रासदी व पीड़ा को शब्द देते हैं। वहीं जर्द पत्तों के वनमें विचरते हुए कश्मीर के युवाओं और आम लोगों के दर्द को एक ऑटोवाले के इन शब्दों में दर्ज करते हैं : साहब, ये चिनार का पेड़ आप देख रहे हैं। जितने पत्ते इस पेड़ में लगे हैं और जितने नीचे बिखरे हैं, उतनी ही दर्द की दास्तान आपको यहाँ मिलेंगी।

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