Saturday, 22 December 2018

बर्लिन है, लंदन भी और मिथिला के सुदूर गांव भी: समीक्षा


सुशांत झा, पत्रकार, इंडिया टुडे ग्रुप: अरविंद दास की किताब बेखुदी में खोया शहर-एक पत्रकार के नोट्स्एक ही साथ यात्रा वृतांत भी है, रिपोर्ताज भी है और संपादकीय पन्नों पर छपने वाले लेख जैसा भी कुछ है. इसमें इक्कीसवीं सदी के दोनों दशक हैं जिसमें बर्लिन और लंदन भी है और मिथिला के सुदूर गांव भी. यह किताब लेखक के छोटे-छोटे लेखों का एक समुच्चय है जिसे पढ़ने के बाद लगता है कि इसकी कमी ये है कि काश इसे थोड़ा और विस्तार में बताया जाता! लेखक चीजों को छूते हुए निकल गए हैं- और शायद ऐसी किताबों की नियति यही होती है जो लेखों के समुच्चय के रूप में छपती है.

हालांकि किताब के शीर्षक में ही इसका संकेत है कि ये एक पत्रकार के नोट्स्हैं, ऐसे में शिकायत गाढ़ी नहीं होनी चाहिए. लेकिन एक बात तय है कि यह किताब उन लोगों को दिलचस्प लगेगी जिनकी रुचि कला, साहित्य, मीडिया, सिनेमा और यात्रा-वर्णनों में है. लघु आलेखों के रूप में लिखे जाने से एक फायदा ये है कि शब्दों का चयन और खर्च बहुत हिसाब से किया गया है. सिनेमा या साहित्य की बातें बोझिल या उबाऊ नहीं लगतीं और शायद यह प्रशिक्षण लेखक के पत्रकार होने की वजह से भी है.

किताब में विश्वविद्यालयों का वर्णन, यूरोप-चीन की यात्रा, सिनेमा और देसी शास्त्रीय कलाओं से लेखक का प्रेम इस किताब को 360 डिग्री का बना देता है. जैसा का लेखक ने खुद लिखा है कि कमला-बलान के आंगन में पलने वालाव्यक्ति जाहिर है नदियों से प्यार करना सीख जाता है. इस किताब में टेम्स, सेन इत्यादि नदियों का जिक्र किसी पुरानी प्रेमिका की चर्चा करने जैसा लगता है.

कई आलेखों को पढ़ते हुए लगता है कि अरविंद के लेखन पर निर्मल वर्मा की हल्की सी छाया है. एक लेख में निर्मल वर्मा और शिमला पर भी है और हिंदी की त्रासदी भी! जिस शिमला को निर्मल वर्मा के लिए भी जाना जाता है वहां निर्मल की किताबें क्यों नहीं मिलती? दुकानदार कहता है, ‘क्योंकि हिंदी की किताबें बिकती कहां हैं’?

पूरी किताब से लेखक का उदारवादी दृष्टिकोण झलकता है. जाहिर है, वे वाम के मीठे आलोचक भी हैं लेकिन भाजपा और संघ परिवार के सबसे ज्यादा.

नाम लेकर हिंदुत्ववादी राजनीति की साहसिक आलोचना की गई है, हालांकि कांग्रेस की नीतियों पर लगभग सायास या अनायास चुप्पी है. जबकि किताब में उस दौर का भी वर्णन है जब देश में दस साल तक कांग्रेस का शासन था!

इस किताब में जेएनयू, मिथिला और एफटीआइआइ (पुणे) बार-बार आता है. जाहिर है लेखक के वहां से रिश्ते रहे हैं. जेएनयू क्या है और उसकी लगभग वाम वर्चस्व वाली राजनीति का स्वरूप क्या है, इसका बढ़िया विश्लेषण किया गया है. अच्छी बात ये है कि वो एक निरपेक्ष विश्लेषण है.

जर्द पत्तों का वननाम के आलेख में कश्मीर में आतंकवाद और भारतीय सेना की तैनाती पर विचार किया गया है और उसे सिर्फ कश्मीर के लोगों के नजरिए से देखने की कोशिश की गई है.
शायद यह लघु आलेख या किस्सागोई के बीच भटक रहे किसी लेखन की एक सीमा हो जिसमें कई बार आप पीड़ित के पक्ष में भावुकतापूर्ण लेखन कर मुद्दों की संपूर्णता को नहीं समझ पाते!

कश्मीरी पंडितों का दर्द, घाटी की आबादी का मजहबीकरण और एक देश के रूप में भारत की अखंडता के प्रश्न को सायास या अनायास नजरअंदाज कर दिया गया है. उसी तरह से राष्ट्रवादी विमर्श बरास्ते मीडियानामके अध्याय में बुरहान वानी को चरमपंथीलिखा गया है. इस शब्द का इस्तेमाल कई विदेशी मीडिया हाउस भी घाटी के आतंकवादियों के लिए करते हैं.

शंघाई का समाजवाद इसी विषय पर संभवत: मनोहर श्याम जोशी के एक लेख की याद दिलाता है. हालांकि जोशीजी का लेख विस्तृत था. लेकिन हिंदी में किसी युवा लेखक ने चीन और शंघाई के बारे में इस तरह से लिखा है, वो भी कम सुकूनदेह नहीं है.

यह पुस्तक मिथिला की संस्कृति को समझने के लिए बहुत उपयोगी है. इसमें करीब आधा दर्जन ऐसे आलेख हैं. सिक्की कला, मिथिला पेंटिंग, मैथिला भाषा में दलित-पिछड़ों का लगभग गैर-मौजूदगी महत्वपूर्ण लेख हैं और भविष्य के लेखकों के लिए शोध सामग्री भी.

आपत्तियां अपनी जगह, इस किताब को इसलिए भी पढ़ना चाहिए क्योंकि आप ऐसे-ऐसे लेखकों, किताबों, फिल्मों, नाटकों और कला के रूपों से परिचित होते हैं जो अन्यथा किसी नौजवान के लिए बीसियों साल का महंगा निवेश हो सकता है.

(इंडिया टुडे वेबसाइट पर प्रकाशित)

Thursday, 20 December 2018

बेख़ुदी में खोया शहर: दिलचस्प एवँ पठनीय

प्रभात, सुधीर, करण थापर, अरविंद, वीर भारत तलवार, ओम थानवी

शुभनीत कौशिक, युवा इतिहासकार, व्याख्याता: पत्रकार अरविंद दास की हाल ही में प्रकाशित किताब बेख़ुदी में खोया शहरपिछले पंद्रह वर्षों में उनके द्वारा लिखे गए लेखों, टिप्पणियों का संकलन है। इन छोटे पर सधे हुए लेखों में से कुछ दुनिया के नामचीन शहरों के बारे में हैं, तो कुछ मीडिया के बदलते हुए परिवेश, कला-संस्कृति के विविध पक्षों के बारे में। कुछ लेख संस्मरणात्मक हैं, तो कुछ रिपोर्ताज की शैली में। ख़ुद अरविंद अपने इन लेखों के बारे में लिखते हैं कि मेरे लिए लेख-टिप्पणी-ब्लॉग लिखने का उद्देश्य छोटे-छोटे वाक्यों में, सहज और कम शब्दों में एक विचार व्यक्त करना, एक चित्र खींचना और एक सवाल उठाना रहा है।

शहरों के बारे में लिखे अरविंद के लेख दिलचस्प और पठनीय हैं। यहाँ शहरों के साथ नदी भी हमजोली की तरह मौजूद है। वह चाहे हाइडेलबर्ग और नेकर हों, या लंदन और टेम्स या फिर पेरिस और सेन। बक़ौल अरविंद, ‘यूरोप की नदियाँ शहरों से इस कदर गूँथी हुई हैं कि आप उसे शहर की संस्कृति से अलगा नहीं सकते।यहाँ तक कि सेन नदी तो अरविंद को ढीठभी जान पड़ती है, ‘जो कल-कल करती हुई बेबात हँसती रहती है।दिवंगत चित्रकार और लेखक अमृतलाल वेगड़ अपनी अप्रतिम कृति सौंदर्य की नदी नर्मदामें नर्मदा के बारे में कुछ ऐसा ही विचार रखते हैं।

टेम्स नदी के किनारे सालाना आयोजित होने वाले जलसे में भाग लेते हुए और टेम्स के प्रति अपना हक़ अदा करते लंदनवासियों को देख अरविंद को भारतीय नदियों की याद हो आती है। और फिर यह सवाल कि हमने अपने नदियों को देवी-देवता मानकर उन्हें पूज्य बना दिया पर प्यार और सम्मान देना कहाँ सीखा!

बतौर पत्रकार, अरविंद पिछले एक दशक में मीडिया के चरित्र में आते बदलाव पर भी अपनी राय बेबाकी से रखते हैं। उनका मानना है कि आज के दौर में कई बार पत्रकार राजनीतिक पार्टियों के पैरोकार बन जाते हैं और उनके एजेंडे को ही मीडिया का एजेंडा मान लेते हैं।अरविंद मीडिया के साथ-साथ सिनेमा और हिंदुस्तानी संगीत के बारे में भी गहराई से लिखते हैं। फिल्मी जुनून के किस्सेहिंदुस्तानी सिनेमा के कुछ अनछुए पहलुओं से हमें रू-ब-रू कराते हैं। वह चाहे मणि कौल और कमल स्वरूप के सिनेमा पर लिखी टिप्पणियाँ हों या एफ़टीआईआई के मार्फत ऋत्विक घटक के योगदान पर लिखे लेख।

इन लेखों में कहीं दरभंगा घराने और विंध्यावासिनी देवी के संगीत की चर्चा है, तो कहीं मिथिला पेंटिंग और कोहबर की बात करते महासुन्दरी देवी, गंगा देवी, सीता देवी, जगदंबा देवी को भी बड़ी ही शिद्दत के साथ याद किया गया है। विद्यापति इन लेखों में आपको जगह-जगह मिलेंगे और अपने बहुरंगी तेवरों में मैथिल समाज भी। एक लेख राजस्थान के अनूठे गाँव तिलोनिया की यात्रा और बंकर रॉय के योगदान बारे में भी है, जिसे पढ़ते हुए मुझे बरसों पहले पढ़ा हुआ भीष्म साहनी का वह लेख याद हो आया, जिसका शीर्षक ही था राजस्थान के एक गाँव की तीर्थ-यात्रा

तिब्बत पर लिखे लेख में अरविंद जहां तिब्बती समुदाय के निर्वासन की त्रासदी व पीड़ा को शब्द देते हैं। वहीं जर्द पत्तों के वनमें विचरते हुए कश्मीर के युवाओं और आम लोगों के दर्द को एक ऑटोवाले के इन शब्दों में दर्ज करते हैं : साहब, ये चिनार का पेड़ आप देख रहे हैं। जितने पत्ते इस पेड़ में लगे हैं और जितने नीचे बिखरे हैं, उतनी ही दर्द की दास्तान आपको यहाँ मिलेंगी।

बेख़ुदी में खोया शहर का लोकार्पण

राजस्थान पत्रिका, 21 दिसंबर 2018
इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में बुधवार को पत्रकार और लेखक अरविंद दास की किताब बेख़ुदी में खोया शहर: एक पत्रकार के नोट्सका लोकार्पण हुआ। दरअसल, घुमक्कड़ पत्रकार अरविंद ने अपनी यात्राओं और अनुभवों के नोट्स को किताब का आकार दिया है। अनुज्ञा बुक्स ने इस किताब को प्रकाशित किया है। मशहूर टीवी पत्रकार करण थापर, वरिष्ठ आलोचक वीर भारत तलवार और राजस्थान पत्रिका के सलाहकार संपादक ओम थानवी ने इस किताब का विमोचन किया। कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध लेखक प्रभात रंजन ने किया।

इस मौके पर ओम थानवी ने कहा कि आज मीडिया सरकार की गोद में झूल गया है। सरकार से तरह-तरह के सहयोग लेकर ही संस्थान और पत्रकार मुग्ध हैं। ऐसे दौर में पत्रकारिता पर बाहर से तो बहुत अंगुलियां उठ रही हैं, लेकिन जब पत्रकारिता के भीतर से ही सवाल उठते हैं तो वह महत्वपूर्ण होता है। यह काम अरविंद दास ने किया है।

उन्होंने कहा कि पत्रकारिता जल्दबाजी में लिखा गया साहित्य है। यह किताब भी अखबारों के लिए लिखे गए लेखों का संग्रह है। लेकिन ऐसी किताबों को सिर्फ पत्रकारिता का सामान समझ कर किनारे नहीं रख देना चाहिए। इसमें साहित्यकार की भाषा और संवेदनशीलता है। अच्छी बात यह है कि लंबे समय तक एक शोधार्थी रहने के बावजूद शोध का बोझ इनके लेखन में नहीं है। यह साहित्य के करीब है। इनकी भाषा आनंद देती है।

किताब के यात्रा वृतांत का उल्लेख करते उन्होंने कहा, ‘देखने और घूमने की जिज्ञासा हम सब में होती है। भारतीय मन तो जैसे घूमने के लिए ही पैदा हुआ है। तीर्थयात्राओं से लेकर विवाह और पर्व आदि तक यात्राओं से जुड़े हैं। ये यात्राएं आपके लिए जगहों का और जीवन का उद्घाटन करती हैं। अरविंद ने इन यात्राओं के दौरान बहुत बारीक नजर से चीजों को देखा और अंकित किया है। जिस तरह ये बरबस केदारनाथ, नागार्जुन, टैगोर आदि साहित्यकारों का ख्याल ले आते हैं, आप इनके साहित्यकार मन की दाद दिए बगैर नहीं रह सकते।

वहीं, वरिष्ठ आलोचक प्रोफेसर वीर भारत तलवार ने कहा कि मीडिया के डॉमिनेंट डिसकोर्स में जिसकी बात नहीं की जाती है इस किताब में उस पर बात की गई है। उन्होंने लेखक की दलितों-पिछड़ों, सबाल्टर्न के प्रति संवेदनशील दृष्टि की बात की। किताब में मिथिला पेंटिंग, बीबीसी और पीर मुहम्मद मुनिस के ऊपर लेखों का जिक्र किया गया है। साथ ही इन लेखों की तुलना शेखर जोशी की कहानियों से की गई है। उन्होंने कहा कि इस किताब में पत्रकारिता और साहित्य का अदभुत संगम है। जेएनयू में प्रोफेसर रहे वीर भारत तलवार ने किताब में शामिल एक लेख का जिक्र करते हुए कहा कि जेएनयू पर इतना मुक्कमल लेख उन्होंने कहीं और नहीं पढ़ा।

उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के संदर्भ में अक्सर स्वतंत्रता आंदोलन की पत्रकारिता की चर्चा होती है और आज के दौर की पत्रकारिता से उसकी तुलना होती है। आज किस तरह अधिकतर टीवी चैनल और अखबार घुटने टेक चुके हैं और बहुत कम हैं, जो अभी भी प्रतिरोध में खड़े हैं। लेकिन इन नकारात्मकता के बीच जो सकारात्मक पक्ष भी उभर रहा है, उस पर ध्यान देने की जरूरत है। ऐसे ही सकारात्मकता दिखाई देती है अरविंद की पत्रकारिता में। उसके लिखे में पत्रकारिता और साहित्य का अद्भुत संगम दिखाई देता है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि अखबार के लिए लिखे गए इन लेखों को किताब के रूप में लाते हुए और विस्तार दिया जा सकता था।


इस मौके पर विकास नारायण राय, गोविंद प्रसाद, डॉक्टर वीनित भार्गव, डॉक्टर बलराम अग्रवाल सहित अकादमिक, साहित्य और पत्रकारिता जगत के कई लोग मौजूद थे। अरविंद ने इससे पहले 'हिंदी में समाचार’ (शोध) किताब लिखी है। साथ ही रिलिजन, पॉलिटिक्स एंड मीडिया: जर्मन एंड इंडियन पर्सपेक्टिव्सकिताब के संयुक्त संपादक रहे हैं। वह बीबीसी के दिल्ली स्थित ब्यूरो में सलाहकार और स्टार न्यूज़ में मल्टीमीडिया कंटेंट एडिटर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से करेंट अफेयर्स कार्यक्रम बनाने वाली प्रतिष्ठित प्रोडक्शन कंपनी, आईटीवी (करण थापर), नई दिल्ली के साथ सलाहकार के रूप में जुड़े हैं। इसके अलावा वह विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, ऑनलाइन पोर्टल के लिए नियमित लेखन में जुटे हुए हैं। 


(समाचार 4 मीडिया से साभार)


किताब की शक्ल में चर्चित हो रहे हैं इस पत्रकार के नोट्स

देश-दुनिया घूमने वाले अरविंद दास ने अपने नोट्स को किताब की शक्ल दी है। नाम है बेख़ुदी में खोया शहर : एक पत्रकार के नोट्स। बुधवार शाम इसका लोकार्पण हुआ

नई दिल्ली

 


Updated: December 20, 2018 05:17:43 pm, www. patrika.com

 

भारतीय टीवी के मशहूर पत्रकार और इंटरव्यूअर करण थापर अरविंद दास की इस किताब के विमोचन कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि थे। वरिष्ठ आलोचक वीर भारत तलवार और राजस्थान पत्रिका के सलाहकार संपादक ओम थानवी ने इस मौके पर आयोजित चर्चा में शामिल हुए। जबकि कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध लेखक प्रभात रंजन ने किया।

सबाल्टर्न के प्रति संवेदनशील दृष्टि

प्रोफेसर वीर भारत तलवार ने किताब में लेखक की निम्नवर्गीय चेतना को खास तौर पर रेखांकित किया। उन्होंने कहा- मीडिया के डॉमिनेंट डिसकोर्स में जिसकी बात नहीं की जाती है इस किताब में उस पर बात की गई है।उन्होंने लेखक की दलितों-पिछड़ों, सबाल्टर्न के प्रति संवेदनशील दृष्टि की बात की। किताब में मिथिला पेंटिंग, बीबीसी और पीर मुहम्मद मुनिस के ऊपर लेखों का जिक्र किया। साथ ही इन लेखों की तुलना शेखर जोशी की कहानियों से की। उन्होंने कहा कि इस किताब में पत्रकारिता और साहित्य का अदभुत संगम है। जेएनयू में प्रोफेसर रहे वीर भारत तलवार ने किताब में शामिल एक लेख का जिक्र करते हुए कहा कि जेएनयू पर इतना मुक्कमल लेख उन्होंने कहीं और नहीं पढ़ा।

बारीक दृष्टि और सहज भाषा

इस मौके पर किताब की चर्चा करते हुए ओमथानवी ने कहा कि अरविंद शोधार्थी है पर शोध का बोझ इनके लेखन में नहीं है। यह किताब साहित्य के करीब है।उन्होंने लेखक की संवेदनशीलता, चीजों को देखने की बारीक दृष्टि और सहज भाषा का उल्लेख किया। उन्होंने किताब में मौजूद यात्रावृतांत का उल्लेख करते हुए कहा कि रघुवीर सहाय ने लिखा है- बोले तो बहुत पर कहा क्या। उन्होंने कहा कि अरविंद की यात्रा में ज्ञान नहीं है, अनुभव है, स्पंदन हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि कई लेखों में विस्तार की गुजांइश थी, पर चूंकि अखबार के लिखे गए लेख हैं तो एक सीमा हमेशा रहती है। पर उन्होंने अगले संस्करण में लेखक से अपने नोट्स में और भी कुछ जोड़ने की गुजारिश की। वर्तमान मोदी शासन के दौर में गोदी मीडियाका जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि लेखक इस किताब में पत्रकारिता पर भीतर से ऊंगुली उठाते हैं।

कार्यक्रम का संलाचन करते हुए प्रभात रंजन ने किताब में संकलित लेखों में साहित्यकता पर जोर दिया। साथ ही निबंधों में मौजूद लालित्य को रेखांकित किया, साथ ही किताब का एक अंश 'सावन का संगीत' पढ़ कर सुनाया। उन्होंने किताब के एक खंड स्मृतियों का कोलाजका खास तौर पर जिक्र किया।

किताब के लेखक अरविंद दास ने कार्यक्रम के शुरुआत में पेरिस यात्रा और मैथिली भाषा पर किताब में शामिल लेखों का पाठ किया। किताब में पाँच खंड हैं जो लेखक की देश-विदेश की यात्राओं, मीडिया, कला-संस्कृति , रिपार्ताज और संस्मरण को समेटे हैं।


Monday, 17 December 2018

Saturday, 8 December 2018

एक पत्रकार के नोट्स


हिंदुस्तान अखबार, 9 दिसंबर 2018.
धर्मेंद्र सुशांत, हिंदुस्तान: किताब एक सजग संवेदनशील लेखक की आंखों-देखी और दिल से महसूस की गई दुनिया के विविधवर्णी शब्दचित्रों का संकलन है. 

इसकी विशेषता यह है कि इसका एक सिरा निपट गाँव से जुड़ता है, तो दूसरा सिरा धुर वैश्विक से. 

लेखक ने इसमें प्रत्यक्ष में निहित वास्तविकता को उजागर किया है. 

Tuesday, 4 December 2018

नई फसल की आमद: बेख़ुदी में खोया शहर


गिरींद्रनाथ झा, लेखक और किसान, चनका बिहार: 

अरविंद दास को उनके लिखे के लिए जानता-पहचानता हूं। उनका लिखा मुझे फील्ड नोट्स लगता है। हाल ही में उनकी किताब आई है- ' बेख़ुदी में खोया शहर- एक पत्रकार के नोट्स।' धन कटनी के तुरंत बाद यह किताब हाथ आई है। ऐसे में यह किताब अपने लिए नई फसल की आमद की तरह है। किताब के पन्नों को पलटते हुए देश- विदेश घूम आता हूं।

अरविंद का पुराना पाठक रहा हूं। उनके ब्लॉग को पढ़ता रहा हूं। उन्हें पढ़ते हुए इतिहासकार सदन झा की एक सीख याद आती है, उन्होंने एक दफे कहा था कि 'फील्ड नोट्स इकट्ठा करिये, यात्राओं और लोगों से मिलते हुए फील्ड नोट्स बनाते रहिये। " आज अरविंद दास की यह किताब पूरा पढ़ने के बाद उस फील्ड नोट्स की अहमियत समझ आई।

अरविंद के लिखे में देश है, परदेश में भी। पन्नों में कविताई खुशबू है। किताब में बाबा नागार्जुन की धमक है, मिथिला पेंटिंग की छटा है और मेरे लिए सबसे प्यारी बात, जहां अंचल की याद बेतहाशा है। उनकी यह पोथी मुझे लोक, संस्कृति, भाषा, जन, साहित्य से रूमानी प्रेम करना सिखाती है।

अरविंद दास की इस किताब में एक संस्मरण है - 'घर एक सपना है ' इसे पढ़ते हुए मुझे जगजीत सिंह की गायी एक गजल याद आती है- रेखाओं का खेल है मुक्कदर, रेखाओं से मात खा रहे हो। इस संस्मरण में फारबिसगंज है, महषि है और जिगन भी। मतलब देश- परदेश सब। इसमें एक जगह अरविंद कहते हैं- गुदरीया बाबा हमारा भी हाथ देखते थे. क्या हमारे हाथ में विद्या रेखा है, क्या हम विदेश जाएँगे बताइए ना, हम उनसे पूछते थे. फ्रैंकफ़र्ट एयरपोर्ट पहुँच कर मैंने एक बार फिर से अपने हाथ को उलट-पुलट कर देखा, हां चंद्र पर्वत पर एक रेखा तो है शायद...!यह किताब पाठक को कई पन्नों में बांधकर रख लेती है, अपने मोहपाश में।

किताब में पत्रकार के फील्ड नोट्स को पाँच खंडों में बांटा गया है- परदेश में बारिश, राष्ट्र सारा देखता है, संस्कृति के अपरूप रंग, उम्मीद-ए-सहर और स्मृतियों का कोलाज. पहले खंड में अरविंद ने उन स्मृतियों, हलचलों को शब्द दिया है जो उन्होंने परदेश में महसूस किया। उनकी यह किताब परदेश की नदियों सेन, नेकर, टेम्स के करीब ले जाती है। नदी की बात करते हुए लेखक बहुत सहज हो जाते हैं। दिल्ली की यमुना से लेकर वे अपने अंचल की कमला-बलान तक का जिक्र करते हैं।

किताब का चौथा खंड मुझे बहुत अच्छा लगा। 'उम्मीद-ए-सहर' शीर्षक में जो नोट्स हैं उसमें अरविंद ने किताबों, पुस्तकालयों, दिल्ली, कश्मीर, मैकलोडगंज-तिब्बत आदि की बात की है। एक पाठक के तौर पर इन सभी नोट्स को और अधिक पन्नों में पढ़ना चाहता हूं।

किताब में 'चंपारण सत्याग्रह का कलमकार' नामक लेख पढ़ते हुए पीर मुहम्मद मूनिस (1882-1949) के बारे में जानकारी मिलती है। मूनिस युवा पत्रकार थे और उन्होंने गांधी जी को चंपारण आने का निमंत्रण देते हुए पत्र लिखा था। इस लेख में अरविंद कहते हैं कि मूनिस का नाम न तो गांधी जी की आत्मकथा में मिलता है और न ही आधुनिक भारत के किसी इतिहास में। मूनिस उस वक्त कानपुर से निकलने वाले पत्र 'प्रताप' के संवाददाता थे। 1914 से वे नियमित रूप से प्रताप के लिए लिखते थे। अरविंद का यह लेख हमें पढ़ना चाहिए।
प्रभात खबर

अरविंद ने 'गाँव में पुस्तकालय' शीर्षक से एक लेख लिखा है। इस लेख में उन्होंने गाँव के पुस्तकालय का जिक्र किया है। पुस्तकालय की चर्चा बहुत कम होने लगी है, ऐसे में इस लेख का अपना महत्व है। इन दिनों नॉर्वे में रहने वाले डॉक्टर प्रवीण झा फेसबुक पर पुस्तकालय को लेकर लोगों को लगातर लिखने की अपील कर रहे हैं।

विद्यापति, गुरुदेव, नागार्जुन, रेणु, निर्मल वर्मा से लेकर स्पिक मैके के किरण सेठ तक को अरविंद ने अपने नोट्स में शब्द दिया है। 'फिर क्या बोले' नामक नोट्स में अरविंद बड़ी बेबाकी से लिखते हैं- "बचपन में जब ऑल इंडिया रेडियो पर दोपहर में बिस्मिल्लाह खान या सिद्धेश्वरी देवी अपना राग अलापती थीं तब हम रेडियो बंद कर देते थे. तब ना तो संगीत की सुध थी ना समझ…” दरअसल अरविंद दास शास्त्रीय संगीत के प्रति अपने अनुराग को यहां पेश करते हैं लेकिन एकदम अलग ढंग से, कह सकते हैं एक शोधार्थी का दृष्टिकोण है, जिसमें पाठक कई कोण निकाल सकता है।

अरविंद की इस किताब में मन के करीब बहुत कुछ है। किताब की सबसे आखिरी नोट 'अंतिम पहर बीता' पढ़ते हुए भावुक हो जाता हूं। इसमें लेखक ने अपनी दाय ( दादी) को शब्द दिया है। अरविंद लिखते हैं - दाय निरक्षर पर ज़हीन थी। लोक अनुभव का ऐसा संसार उसके पास था जहां शास्त्रीय ज्ञान बौना पड़ जाता है! जब हम उसे चिढ़ाते तो वो अपना नाम हंसते हुए लिखकर दिखाया करती- जानकी। पर यह नाम उसे पसंद नहीं था। वो कहती कि जानकी के जीवन में बहुत कष्ट लिखा होता है....'

और इसी में अंत में अरविंद लिखते हैं- " हम रोजी रोटी के लिए इस शहर से उस शहर भटकते रहे। दाय खूंटे की तरह अपनी जमीन से गड़ी रही। जब भी उससे कहते दिल्ली चलो, तो उसका टका सा जवाब होता- मरते समय क्या मगहर जाऊंगी....."

अलग अलग रंग के फील्ड नोट्स को एक किताब में पढ़ना सचमुच अच्छा लगा। यह किताब अपने कवर के लिए भी याद रहेगी। आवरण चित्र में अनोखी मिथिला पेंटिंग है, हवाई जहाज भी मछली के रूप में है! मिथिला पेंटिंग की अद्भुत छटा !
-----------
  1. किताब: बेख़ुदी में खोया शहर – एक पत्रकार के नोट्स
  2. प्रकाशक: अनुज्ञा बुक्स, नई दिल्ली
  3. मूल्य- ₹375
(प्रभात खबर, 9 दिसंबर 2018, को प्रकाशित)

Thursday, 29 November 2018

रूमानियत से भरे एक पत्रकार के नोट्स


समीक्षक: अनुपम, सहायक प्रोफेसर, हिंदी विभाग, गवर्मेंट गर्ल्स कॉलेज, नागौर, राजस्थान

नोट्स शब्द सुनकर छात्र जीवन की याद आ जाती है. उन प्रतिभावान विद्यार्थियों की याद आ जाती है जो नोट्स बनाते थे और जो दुर्लभ होते थे. पर बेख़ुदी में खोया शहर: एक पत्रकार के नोट्स किताब के लेखक अरविंद दास के नोट्स सुलभ हैं. देश-विदेश घूमकर उन्हें जो अनुभव हुए उसको ये किताब बयां करती है.

आईआईएमसी से पत्रकारिता में प्रशिक्षण और जेएनयू से साहित्य और पत्रकारिता में शोध के बाद विभिन्न समाचार पत्रों में अरविंद दास जो विचार, टिप्पणी और संस्मरण लिखते रहे उनको इस किताब में एक जगह संग्रहित किया गया है. हर लेख अपने आप में स्वतंत्र और पठनीय हैं, पर गौर से पढ़ने पर उनमें एक संबद्धता दिखाई देती है, जिसमें लेखक के व्यक्तित्व की झलक भी है. पिछले दो दशकों में जबसे बड़ी पूंजी से पत्रकारिता संचालित होने लगी रूमानियत के लिए उसमें जगह कम बची है. इस पुस्तक में लेखक शुरु से आखिर तक रूमानी बना रहा है, जो युवाओं को खास तौर पर पसंद आएगी. ये नोट्स अपने लोक, अपनी संस्कृति, अपनी भाषा और कलाओं की चिंता करती है. इन लेखों में इन्हें बचाने की जदोजह्द भी है.

ललित निबंध शैली में जहाँ संस्मरण हैं वहीं संस्मरणात्मक शैली में आत्मकथन. इस किताब को किसी एक विधा के परंपरागत सांचे में हम ढाल नहीं पाते. जो इस किताब की खूबी है. किताब में टिप्पणियों को पाँच खंडों में बांटा गया है-परदेश में बारिश, राष्ट्र सारा देखता है, संस्कृति के अपरूप रंग, उम्मीद-ए-सहर और स्मृतियों का कोलाज. पहला खंड उन स्मृतियों, हलचलों को समेटे है जो लेखक ने परदेश में महसूस किया. इसमें सेन, नेकर, टेम्स नदी है तो पर्थ और कोलंबो का समंदर भी है. वियना और शंघाई का शहर भी है और जर्मनी के विश्वविद्यालय भी. खास बात यह है कि इनमें बसा भारत भी है. उसकी आवाजाही हर जगह है.

दूसरे खंड में, मीडिया, समांतर सिनेमा, बॉलीवुड, रंगमंच आदि पर लेखक ने कलम चलाई है और वह उन बिंदुओं को हमारे सामने लाते हैं जो कहीं छूट रहा है, कहीं टूट रहा है, कहीं बदल रहा है. बात एनएसडी की हो या क्षेत्रीय सिनेमा की धमक की. अरविंद अपनी बात सूक्तियों में कहते हैं- राजनीति और राजनीतिक विचारधारा की बातें अब पत्रकारिता के लिए अवगुण मानी जाती है.  वे बार-बार हिंदी पत्रकारिता की भूमंडलीकरण के बाद विकट स्थिति को हमारे सामने लाते हैं जो मुनाफा केंद्रित होकर बाजार के हवाले हो चुकी है. ये उनके शोध का विषय भी है.

किताब का तीसरा खंड शास्त्रीय संगीत, भाषा, पेंटिग, लोक संगीत आदि से जुड़ा है. यहाँ दरभंगा घराना है, मिथिला पेंटिग है और शेखावटी भी. नौटंकी के साथ वे विंध्यवासिनी देवी, सिद्धेश्वरी देवी की चर्चा करते हैं. वे इन कलाओं के प्रति गहरी चिंता व्यक्त करते है, जो आम जन से दूर होते जा रही है. वे अपने लेखों में मुक्तिबोध की तरह प्रश्न उठाते हैं जिन करीब 50 साहित्यकारों को मैथिली में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला है, सभी उच्च जातियों से ही क्यों आते हैं?’
चौथे खंड उम्मीद-ए-सहर में वे किताबों, पुस्तकालयों, दिल्ली, कश्मीर, मैकलोडगंज-तिब्बत आदि की बात करते हैं. इस खंड की टिप्पणियाँ अपेक्षाकृत बड़ी है जिसमें लेखक की विचारधारा उभर कर आती है. इसमें लेखक का जेएनयू के ऊपर एक विस्तृत लेख और टिप्पणी है, जिसकी काफी चर्चा हुई थी. जेएनयू की प्रतिरोध की संस्कृति और संवेदनशीलता का जिक्र खास तौर पर लेखक ने किया है, जो सही भी है. मौजूदा दौर में जेएनयू को जिस तरह मीडिया में दिखाया, बताया जा रहा है उसको देखते हुए यह लेख मौजूं है.

आखिरी खंड में, शख्सियतों को लेकर संस्मरण है जिसमें पारिवारिक संस्मरण भी शामिल हैं. पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी पीर मुहम्मद मुनिस ने गाँधीजी को चिट्ठी लिख कर चंपारण बुलाया पर वे अपरिचित रहे. लेखक उनकी चर्चा करते हैं. इन स्मृतियों में नागार्जुन, रवींद्रनाथ ठाकुर, विद्यापति, भूपेन हजारिका हैं तो मणि कौल, प्रभाष जोशी, विद्रोही, स्वदेश दीपक भी. लेखक अपनी मुलाकातों, अध्ययन की कूची से एक तरह से रेखाचित्र खींचते हैं और अपने क्षेत्र में इनके योगदान को समग्रता में समेटते हैं. यह आश्चर्य नहीं कि किताब में बार-बार विद्यापति,नागार्जुन दिख जाते हैं क्योंकि लेखक का स्वंय का संबंध भी उसी क्षेत्र से है.

पूरी किताब उस संवेदनशील लेखक-पत्रकार की है जो अपने लोक, संस्कृति, भाषा, जन, साहित्य से रूमानी प्रेम करता है और इस पूंजीवादी समय में संकट भी इन्हीं के ऊपर है. कुछ टिप्पणियाँ अधूरी सी लगती है, शायद अखबारों के लिए लिखी होने के कारण शब्द विस्तार की गुंजाइश नहीं थी.
मेरे हिसाब से किताब का खंड परदेश से देश और परदेश होना चाहिए था, जिसे लेखक ने परदेश से शुरू किया है. कारण व्यक्ति ग्लोबलबाद में होता है, ‘लोकलपहले

अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली से छपी पुस्तक की साज-सज्जा बेहतर है, हार्डबाउंड में कीमत 375 रुपए है. 

(लोकमत न्यूज़ में प्रकाशित)