Friday, 31 July 2020
Monday, 25 November 2019
Thursday, 12 September 2019
भाई ये किताब जल्दी पढ़ो
यह किताब एक पत्रकार के नोट्स से बनी है. जिसमें बहुत सारे किस्से हैं. और कहीं ना कहीं यह पता चल जाता है कि लेखक को अपने कॉलेजों में से एक जेएनयू से कितना प्यार है. और होना भी चाहिए. लेखक जहां जहां गया वहां वहां उसने कुछ लिखा है.
आपको भी यह किताब नॉस्टैलजिया से भर देगी. और मंद मुस्कान आपको ज्यादातर किस्सों में देगी, बाकी में आपको सोचने को मजबूर कर देगी.
व्यक्तिगत तौर पर कहूँ, मतलब मेरी राय तो है भाई जल्दी पढ़ो. बहुत मजा आ रहा है. छोटी छोटी चीज है जो हम और किताबों में शायद मिस करते हैं, यहां मिल रही है. दुकानों के किस्से हैं. मूवीज के किस्से हैं. और हां, सबसे जरूरी बीच बीच में कविताएँ. (साभार इंस्टाग्राम)
Sunday, 24 February 2019
कुछ स्मृतियां, फुटकर नोट्स में
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सुशांत झा
Monday, 4 February 2019
बेखुदी में खोया शहर
![]() |
| लोकार्पण की तस्वीर |
मोहन जोशी: लेखक-पत्रकार अरविंद दास की अनुज्ञा बुक्स से प्रकाशित पुस्तक बेख़ुदी में
खोया शहर: एक पत्रकार के नोट्स का मशहूर पत्रकार करण थापर ने आईआईसी, दिल्ली में विमोचन
किया.
इस कार्यक्रम में वरिष्ठ आलोचक वीर भारत तलवार और राजस्थान पत्रिका के
सलाहकार संपादक ओम थानवी भी शामिल थे. कार्यक्रम का संचालन हिंदी के लेखक प्रभात
रंजन ने किया.
तलवार ने कहा कि मीडिया के डॉमिनेंट डिसकोर्स में जिसकी बात नहीं की जाती
है इस किताब में उस पर बात की गई है। उन्होंने लेखक की दलितों-पिछड़ों, सबाल्टर्न के प्रति
संवेदनशील दृष्टि की बात की। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के संदर्भ में जब बात
होती है तब अक्सर राष्ट्रीय आंदोलन के दौर की पत्रकारिता की चर्चा होती है ,जब एक लक्ष्य और
उदेश्य को लेकर देश में पत्रकारिता की जाती थी. आजकल अधिकतर टीवी चैनल और अखबार
घुटने टेक चुके हैं और बहुत कम हैं जो अभी भी प्रतिरोध में खड़े हैं। लेकिन इन
नकारात्मकता के बीच जो सकारात्मक पक्ष भी उभर रहा है, उस पर ध्यान देने की
जरूरत है। ऐसे ही सकारात्मकता अरविंद दास की पत्रकारिता में दिखाई देती है। यहाँ
पत्रकारिता और साहित्य का अदभुत संगम है.
तलवार ने कहा कि हिंदी में शेखर जोशी ने मर्म को छूने वाली कहानियाँ लिखी
हैं. पर कहानी के अंत में ऐसी जगह दृष्टि जाती है जिसकी कल्पना पहले पाठक ने नहीं
की थी. वह पाठकों के दिल को छूती है. इस किताब में शामिल लेख उसी परंपरा में
जुड़ते हैं.
किताब के लेखों से उदाहरण देते हुए उन्होंने शंघाई की यात्रा का हवाला देते
हुए कहा कि लेखक महानगर की चर्चा तो करता ही है पर उसकी दृष्टि शंघाई से दूर
गाँवों और कृषक समाज पर भी गई है. इसी तरह मिथिला पेंटिंग में आई आधुनिता, जिसमें भ्रूण हत्या
से लेकर गुजरात के दंगों का चित्रण है, की इस किताब में
चर्चा है. तलवार ने कहा कि पूरी दुनिया में मिथिला पेंटिंग की प्रदर्शनियाँ लगती
है पर दरभंगा-मधुबनी जिले में एक भी कलादीर्घा नहीं है लेखक की नजर इस बात पर गई
है.
अपने वक्तव्य में तलवार ने स्वतंत्रता आंदोलन के सेनानी और ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ के पैरोकार पीर
मुहम्मद मूनिस का जिक्र किया. उन्होंन कहा कि लेखक इस बात का ठीक ही उल्लेख करता
है कि महात्मा गाँधी मूनिस का जिक्र करने से चूक गए, पर वे मूनिस के यहाँ
आते-जाते थे और खाना खाते थे. तलवार ने खास तौर से जेएनयू के ऊपर एक लेख का जिक्र
करते हुए कहा कि इतना अच्छा लेख उन्होंने कहीं नहीं पढ़ा. इस लेख में जेएनयू के
इतिहास, चरित्र, वातावरण, उपलब्धियों और वर्तमान
संकट का यथार्थपरक तस्वीर खींची गई है. उन्होंने एक लेख के हवाले से मैथिली भाषा
में ब्राह्मणों के वर्चस्व और दलितों-शूद्रों की अनुपस्थिति का उल्लेख किया. तलवार
ने कहा कि मैथिली भाषा का आंदोलन ब्राह्मणओं के नेतृत्व में ब्राह्मणों का आंदोलन
रहा है और इसलिए सफल नहीं हो सका.
कार्यक्रम में ओम
थानवी ने कहा कि उदारीकरण-भूमंडलीकरण के दौर में पत्रकारिता पर बाहर से तो बहुत
अंगुलियां उठ रही हैं, लेकिन जब पत्रकारिता
के भीतर से ही सवाल उठते हैं तो वह महत्वपूर्ण होता है। यह काम इस किताब में किया
है। अरविंद के पास साहित्यकार की भाषा और संवेदनशीलता है। शोधार्थी होने के बावजूद
शोध का बोझ नहीं है। किताब साहित्य के करीब है, भाषा आनंद देती है।
उन्होंने कहा कि अरविंद की यात्रा में ज्ञान नहीं है, अनुभव है और स्पंदन
है।
कार्यक्रम का संलाचन करते हुए प्रभात रंजन ने संकलित लेखों में साहित्यिकता
पर जोर दिया। उन्होंने संस्मरणों में मौजूद लालित्य को रेखांकित किया.
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(हंस, फरवरी 2019 में संपादित अंश प्रकाशित)
Wednesday, 23 January 2019
Sunday, 20 January 2019
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