Thursday, 29 November 2018

रूमानियत से भरे एक पत्रकार के नोट्स


समीक्षक: अनुपम, सहायक प्रोफेसर, हिंदी विभाग, गवर्मेंट गर्ल्स कॉलेज, नागौर, राजस्थान

नोट्स शब्द सुनकर छात्र जीवन की याद आ जाती है. उन प्रतिभावान विद्यार्थियों की याद आ जाती है जो नोट्स बनाते थे और जो दुर्लभ होते थे. पर बेख़ुदी में खोया शहर: एक पत्रकार के नोट्स किताब के लेखक अरविंद दास के नोट्स सुलभ हैं. देश-विदेश घूमकर उन्हें जो अनुभव हुए उसको ये किताब बयां करती है.

आईआईएमसी से पत्रकारिता में प्रशिक्षण और जेएनयू से साहित्य और पत्रकारिता में शोध के बाद विभिन्न समाचार पत्रों में अरविंद दास जो विचार, टिप्पणी और संस्मरण लिखते रहे उनको इस किताब में एक जगह संग्रहित किया गया है. हर लेख अपने आप में स्वतंत्र और पठनीय हैं, पर गौर से पढ़ने पर उनमें एक संबद्धता दिखाई देती है, जिसमें लेखक के व्यक्तित्व की झलक भी है. पिछले दो दशकों में जबसे बड़ी पूंजी से पत्रकारिता संचालित होने लगी रूमानियत के लिए उसमें जगह कम बची है. इस पुस्तक में लेखक शुरु से आखिर तक रूमानी बना रहा है, जो युवाओं को खास तौर पर पसंद आएगी. ये नोट्स अपने लोक, अपनी संस्कृति, अपनी भाषा और कलाओं की चिंता करती है. इन लेखों में इन्हें बचाने की जदोजह्द भी है.

ललित निबंध शैली में जहाँ संस्मरण हैं वहीं संस्मरणात्मक शैली में आत्मकथन. इस किताब को किसी एक विधा के परंपरागत सांचे में हम ढाल नहीं पाते. जो इस किताब की खूबी है. किताब में टिप्पणियों को पाँच खंडों में बांटा गया है-परदेश में बारिश, राष्ट्र सारा देखता है, संस्कृति के अपरूप रंग, उम्मीद-ए-सहर और स्मृतियों का कोलाज. पहला खंड उन स्मृतियों, हलचलों को समेटे है जो लेखक ने परदेश में महसूस किया. इसमें सेन, नेकर, टेम्स नदी है तो पर्थ और कोलंबो का समंदर भी है. वियना और शंघाई का शहर भी है और जर्मनी के विश्वविद्यालय भी. खास बात यह है कि इनमें बसा भारत भी है. उसकी आवाजाही हर जगह है.

दूसरे खंड में, मीडिया, समांतर सिनेमा, बॉलीवुड, रंगमंच आदि पर लेखक ने कलम चलाई है और वह उन बिंदुओं को हमारे सामने लाते हैं जो कहीं छूट रहा है, कहीं टूट रहा है, कहीं बदल रहा है. बात एनएसडी की हो या क्षेत्रीय सिनेमा की धमक की. अरविंद अपनी बात सूक्तियों में कहते हैं- राजनीति और राजनीतिक विचारधारा की बातें अब पत्रकारिता के लिए अवगुण मानी जाती है.  वे बार-बार हिंदी पत्रकारिता की भूमंडलीकरण के बाद विकट स्थिति को हमारे सामने लाते हैं जो मुनाफा केंद्रित होकर बाजार के हवाले हो चुकी है. ये उनके शोध का विषय भी है.

किताब का तीसरा खंड शास्त्रीय संगीत, भाषा, पेंटिग, लोक संगीत आदि से जुड़ा है. यहाँ दरभंगा घराना है, मिथिला पेंटिग है और शेखावटी भी. नौटंकी के साथ वे विंध्यवासिनी देवी, सिद्धेश्वरी देवी की चर्चा करते हैं. वे इन कलाओं के प्रति गहरी चिंता व्यक्त करते है, जो आम जन से दूर होते जा रही है. वे अपने लेखों में मुक्तिबोध की तरह प्रश्न उठाते हैं जिन करीब 50 साहित्यकारों को मैथिली में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला है, सभी उच्च जातियों से ही क्यों आते हैं?’
चौथे खंड उम्मीद-ए-सहर में वे किताबों, पुस्तकालयों, दिल्ली, कश्मीर, मैकलोडगंज-तिब्बत आदि की बात करते हैं. इस खंड की टिप्पणियाँ अपेक्षाकृत बड़ी है जिसमें लेखक की विचारधारा उभर कर आती है. इसमें लेखक का जेएनयू के ऊपर एक विस्तृत लेख और टिप्पणी है, जिसकी काफी चर्चा हुई थी. जेएनयू की प्रतिरोध की संस्कृति और संवेदनशीलता का जिक्र खास तौर पर लेखक ने किया है, जो सही भी है. मौजूदा दौर में जेएनयू को जिस तरह मीडिया में दिखाया, बताया जा रहा है उसको देखते हुए यह लेख मौजूं है.

आखिरी खंड में, शख्सियतों को लेकर संस्मरण है जिसमें पारिवारिक संस्मरण भी शामिल हैं. पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी पीर मुहम्मद मुनिस ने गाँधीजी को चिट्ठी लिख कर चंपारण बुलाया पर वे अपरिचित रहे. लेखक उनकी चर्चा करते हैं. इन स्मृतियों में नागार्जुन, रवींद्रनाथ ठाकुर, विद्यापति, भूपेन हजारिका हैं तो मणि कौल, प्रभाष जोशी, विद्रोही, स्वदेश दीपक भी. लेखक अपनी मुलाकातों, अध्ययन की कूची से एक तरह से रेखाचित्र खींचते हैं और अपने क्षेत्र में इनके योगदान को समग्रता में समेटते हैं. यह आश्चर्य नहीं कि किताब में बार-बार विद्यापति,नागार्जुन दिख जाते हैं क्योंकि लेखक का स्वंय का संबंध भी उसी क्षेत्र से है.

पूरी किताब उस संवेदनशील लेखक-पत्रकार की है जो अपने लोक, संस्कृति, भाषा, जन, साहित्य से रूमानी प्रेम करता है और इस पूंजीवादी समय में संकट भी इन्हीं के ऊपर है. कुछ टिप्पणियाँ अधूरी सी लगती है, शायद अखबारों के लिए लिखी होने के कारण शब्द विस्तार की गुंजाइश नहीं थी.
मेरे हिसाब से किताब का खंड परदेश से देश और परदेश होना चाहिए था, जिसे लेखक ने परदेश से शुरू किया है. कारण व्यक्ति ग्लोबलबाद में होता है, ‘लोकलपहले

अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली से छपी पुस्तक की साज-सज्जा बेहतर है, हार्डबाउंड में कीमत 375 रुपए है. 

(लोकमत न्यूज़ में प्रकाशित)

Sunday, 25 November 2018

शोध मिज़ाज वाले पत्रकार के नोट्स

पत्रकार और फिल्म निर्देशक, अविनाश दास
अविनाश दास: उन दिनों हम इंटरमीडिएट में आये आये थे, जब अरविंद दास से मुलाक़ात हुई।

मेरे बड़े भाई के ससुराली कनेक्शन वाले इन हमउम्र साले से मेरी दोस्ती हो गयी, क्योंकि हमारे बीच साहित्य कॉमन फैक्टर था।

शिक्षा की औपचारिक और सघन धारा से मैं डीरेल हो गया, लेकिन अरविंद दास लीक पर बने रहे। उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की। शोध वाला मिज़ाज बनाया। गंभीर पत्रकार बने, तो हमारा मज़ाक़ वाला रिश्ता ख़त्म हो गया, ईर्ष्या वाला ज़्यादा बन गया कि काश मैं भी अरविंद दास हो पाता।
फिल्म और सीरियल निर्देशक प्रभात प्रभाकर के फेस बुक वॉल से

हम मिलते रहे, बातें करते रहे। मुझे ख़ुशी हुई जब पिछली बार उन्होंने अपनी किताब "हिंदी में समाचार" के विमोचन समारोह में मुझे आमंत्रित किया। उनकी नयी किताब अनुज्ञा प्रकाशन से आयी है, बेख़ुदी में खोया शहर [एक पत्रकार के नोट्स]।

काश कि इसके विमोचन समारोह में भी शामिल हो पाता, लेकिन दिल्ली-बदर होने और मुंबई में दिहाड़ी की मजबूरी के चलते ऐसा नहीं हो पाएगा। मैं अरविंद जी को मुबारकबाद देता हूं, शुभकामनाएं देता हूं। उनकी हर कामयाबी के साथ हमारा मान बढ़ता है।

Friday, 23 November 2018

परदेश में बारिश

प्रोफेसर मैनजर पांडेय, साथ में कैथी और किताब 

गाँव में डबरा और चहबच्चा पानी से ऊब-डूब है। घर के सामने डबरे में मखाना के पत्ते धीरे-धीरे गल के बिखर रहे हैं, कुछ दिनों में मछुआरे कीचड़ और पानी से छान कर इसे निकालेंगे।

गाँव में हाल ही में बने उत्क्रमित (अपग्रेडेड) मध्य विद्यालयके बच्चे मास्टर साहब की गैर मौजूदगी में कांटों की परवाह किए बिना मखाना के पौधे से कच्चे मखाना निकालने में मग्न हैं। बिहार के स्कूलों में मिड डे मिलऔर लड़कियों के लिए साइकिल की चर्चा सब करते हैं, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता पर किसी का ध्यान नहीं है। दादी अपने लोक अनुभव का आश्रय लेकर कहती है आसमान में ही जब छेद हैं तब दर्जी के बाप का दिन है कि उसे सिलेगा।

बाहर फिर झकझोर के बारिश हो रही है। खिड़की को जान बूझ कर मैंने बंद नहीं किया है। बारिश की कुछ छीटें मेरे बिस्तर पर पर रही है। माँ को शायद इस बात का पता नहीं है कि बिस्तर भींग रहा है, नहीं तो पहले झिड़केगी। फिर हँसेगी और पापा की ओर मुखातिब होते हुए कहेगी कि कैसे तुम रहते हो दिल्ली में पता नहीं! जाओ, नहीं सुधरोगे तुम!

बचपन में जब बारिश के मौसम में स्कूल से लौटना पड़ता था, तब अपने बस्ते को पन्नी में लपेट कर, पेट से सटाए हम बुशर्ट के अंदर कर लेते थे। माँ घर के ओसारे में बैठी हमारा इंतज़ार कर रही होती और बारिश की बूंदें फूस के घर से हरहरा कर ओलती में गिरती जातीं।

बाद में जायसी को पढ़ते हुए बरसै मेघा झकोरी, झकोरी मोरे दुइ नैन चुवै जस ओरिका मतलब समझा। प्रोफ़ेसर मैनेजर पांडेय साहित्य का समाजशास्त्र पढ़ाते हुए बताते थे कि किस तरह राजस्थान में कुछ कक्षाओं में उन्हें नागमती का विरह वर्णनऔर इन पंक्तियों का अर्थ समझाने में दिक्कत आती थी। महानगरों में रहने वाले जिन्होंने केवल फ़िल्मों गीतों में सावन-भादो में नायिकाओं को भींगते देखा है उन्हें कभी-कभी मिथिला और अवध के गाँवों को भी अपनी यात्रा में शामिल करना चाहिए। किस तरह से किसानों का जीवन स्याह मेघ और उमड़ते-घुमड़ते बादल की मौजों पर टिका रहता है। कैसे फूस के घर की छावन की चिंता उन्हें सताती रहती है, जिनके घर के पुरुष दिल्ली और पंजाब में मजदूरी कर रहे हैं।

(किताब मे शामिल लेख-सावन का संगीत का एक अंश)

Thursday, 22 November 2018

एक संवेदनशील पत्रकार के अनूठे अनुभव: बेख़ुदी में खोया शहर

ओम थानवी, जनसत्ता के पूर्व संपादक
ओम थानवी के फेसबुक वॉल से:  जनसत्ता में छब्बीस बरस काम करते हुए शायद कभी सोचा नहीं कि इसमें कितनी चीज़ें बची रह जाएंगी। जो बचा रह जाएगा, उसके शायद और रूप भी हों। आदरणीय प्रभाष जोशी, अच्युतानंद मिश्र, राहुल देव वाला सामर्थ्य मुझमें न था, फिर भी देख कर ख़ुशी होती है कि कोई दो दर्जन किताबें सामने आई हैं, जिनकी सामग्री जनसत्ता में छपी। अशोक वाजपेयी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, कृष्ण कुमार, के बिक्रम सिंह, प्रभाकर श्रोत्रिय, प्रयाग शुक्ल, पद्मा सचदेव, सुधीर चंद्र, मधु कांकरिया, प्रेमपाल शर्मा से लेकर पंकज पराशर और सीरज सक्सेना जैसे युवतर लेखकों की किताबें इनमें शामिल हैं।

इसी कड़ी में कल अरविंद दास की किताब मिली है - बेख़ुदी में खोया शहर (अनुज्ञा बुक्स)। जनसत्ता में ये लेख सम्पादकीय और रविवारी पन्नों पर छपे। एक संवेदनशील पत्रकार के अनूठे अनुभव इस किताब में दर्ज़ हैं। समाज, प्रकृति, लोकरंग, कला-साहित्य और यात्राओं आदि में जीवन का स्पंदन वे खोजते हैं। महसूस करते हैं। बड़ी सहजता के साथ बयान करते हैं।

लेखन लेखकों का। पर उसकी प्रस्तुति में मंगलेश डबराल, प्रियदर्शन (बाद में एनडीटीवी में), अशोक शास्त्री (अब विदा), सूर्यनाथ सिंह, राजेन्द्र राजन, प्रमोद द्विवेदी, रामजन्म पाठक, अरविंद शेष, अमर छाबड़ा जैसे सहकर्मियों की भूमिका भी अहम रही। अख़बारों के मौजूदा हाल को देखते संपादन में वैसी टीम का जुटना अब शायद आसान न हो।

Tuesday, 20 November 2018

जहां पेरिस में बहती सेन और बिहार में गूंजते रेडियो का जिक्र एक साथ है

अमेज़न लिंक: https://www.amazon.in/dp/B07K3CDC5J

किताब के बारे में: बेख़ुदी में खोया शहर, अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली 375 रुपए
ब्लर्ब: यह किताब वैचारिक लेखन में बहुआयामी है। लेखक की संवेदनशील दृष्टि, विषय-वस्तु का दायरा, मार्मिक अंदाज़ और सहज भाषा एक अलग आस्वाद लिए है जिसे लेखन की किसी एक विधा में अंटाया नहीं जा सकता।

संकलित लेखों में निजीपन, व्यक्ति विशेष, लोक-शहर के प्रति अनुराग एकाधिक बार है। लंदन, पेरिस, वियना, शंघाई, कोलंबो, दिल्ली, बंगलुरु, पुणे, श्रीनगर के साथ-साथ मैकलोडगंज, मगध, मिथिला व बेलारही, तिलोनिया, तरौनी जैसे गाँव भी हैं। जेएनयू और जिगन विश्वविद्यालय भी है। ग्लोबलऔर लोकलकी इस घुमक्कड़ी में जहाँ कुछ पहचाने चेहरे हैं, वहीं कुछ अनजाने राही। समंदर की आवाज़ के साथ-साथ डबरा, चहबच्चा की अनुगूंज भी है। होटल-रेस्तरां के साथ-साथ ढाबा भी।

इन पन्नों में समंदर पार से लहराती आती रेडियो की आवाज़ है। उदारीकरण के बाद अख़बार के पन्नों पर फैली ख़ुश ख़बरहै। न्यूज़रूम नेशनलिज्मकी आहट भी। बॉलीवुड का स्थानीय रंग है, हिंदुस्तानी और लोक संगीत की मधुर धुन है, साथ ही नौटंकी का शोक गीत भी। मिट्टी पर बने कोहबर की ख़ुशबू एक तरफ़ है, हवेलियों में बिखरते भित्तिचित्र दूसरी तरफ़।

उदास गिरगिट से बात करता हुआ एक विद्रोही कवि है। हाथ पकड़ कर सिखाने वाला एक कबीरा पत्रकार है। स्वभाव के विपरीत नहीं जाने की सलाह देने वाला एक फक्कड़ फ़िल्मकार भी। एक तरफ़ नॉस्टेलजिया, स्मृति और विस्मृति के गह्वर हैं, दूसरी तरफ़ वर्तमान का यथार्थ है और भविष्य के रोशनदान भी।

भूमंडलीकरण के दौर में, 21वीं सदी के दो दशकों के बीच, लिखे गए इन लेखों में एक पत्रकार और शोधार्थी का साझा अनुभव है। वादी स्वर एक ब्लॉगर का है। शैली-मैंऔर टोका-टोकीकी है।

लेखक परिचय: 

अरविंद दास
हिंदी में समाचार’(शोध) किताब के लेखक। रिलिजन, पॉलिटिक्स एंड मीडिया: जर्मन एंड इंडियन पर्सपेक्टिव्सकिताब के संयुक्त संपादक। अर्थशास्त्र, साहित्य और पत्रकारिता की मिली-जुली पढ़ाई। डीयू, आईआईएमसी और जेएनयू से शिक्षा-दीक्षा। एफटीआईआई से फ़िल्म एप्रिसिएशन कोर्स और एनसीपीयूएल से उर्दू में डिप्लोमा।

पीएचडी के दौरान जेएनयू में यूजीसी के रिसर्च फेलो और जर्मनी के जिगन यूनिवर्सिटी में डीएफजी के पोस्ट-डॉक्टरल फेलो रहे।

बीबीसी के दिल्ली स्थित ब्यूरो में सलाहकार और स्टार न्यूज़ में मल्टीमीडिया कंटेंट एडिटर रहे। पिछले कुछ वर्षों से करेंट अफेयर्स कार्यक्रम बनाने वाली प्रतिष्ठित प्रोडक्शन कंपनी, आईटीवी (करण थापर), नई दिल्ली के साथ सलाहकार के रूप में जुड़े हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, ऑनलाइन पोर्टल के लिए नियमित लेखन।

Notes of a journalist

चर्चित पत्रकार करण थापर 

About the book: 

This book is written by a serious media researcher and thought provoking contemporary author in his own unique style which is not devoid of asking questions. This book encompasses travel, politics, culture and contemporary media in India. Written in lucid and entertaining way this book is a real treat for the readers.


(Amazon reviewer)