Friday, 23 November 2018

परदेश में बारिश

प्रोफेसर मैनजर पांडेय, साथ में कैथी और किताब 

गाँव में डबरा और चहबच्चा पानी से ऊब-डूब है। घर के सामने डबरे में मखाना के पत्ते धीरे-धीरे गल के बिखर रहे हैं, कुछ दिनों में मछुआरे कीचड़ और पानी से छान कर इसे निकालेंगे।

गाँव में हाल ही में बने उत्क्रमित (अपग्रेडेड) मध्य विद्यालयके बच्चे मास्टर साहब की गैर मौजूदगी में कांटों की परवाह किए बिना मखाना के पौधे से कच्चे मखाना निकालने में मग्न हैं। बिहार के स्कूलों में मिड डे मिलऔर लड़कियों के लिए साइकिल की चर्चा सब करते हैं, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता पर किसी का ध्यान नहीं है। दादी अपने लोक अनुभव का आश्रय लेकर कहती है आसमान में ही जब छेद हैं तब दर्जी के बाप का दिन है कि उसे सिलेगा।

बाहर फिर झकझोर के बारिश हो रही है। खिड़की को जान बूझ कर मैंने बंद नहीं किया है। बारिश की कुछ छीटें मेरे बिस्तर पर पर रही है। माँ को शायद इस बात का पता नहीं है कि बिस्तर भींग रहा है, नहीं तो पहले झिड़केगी। फिर हँसेगी और पापा की ओर मुखातिब होते हुए कहेगी कि कैसे तुम रहते हो दिल्ली में पता नहीं! जाओ, नहीं सुधरोगे तुम!

बचपन में जब बारिश के मौसम में स्कूल से लौटना पड़ता था, तब अपने बस्ते को पन्नी में लपेट कर, पेट से सटाए हम बुशर्ट के अंदर कर लेते थे। माँ घर के ओसारे में बैठी हमारा इंतज़ार कर रही होती और बारिश की बूंदें फूस के घर से हरहरा कर ओलती में गिरती जातीं।

बाद में जायसी को पढ़ते हुए बरसै मेघा झकोरी, झकोरी मोरे दुइ नैन चुवै जस ओरिका मतलब समझा। प्रोफ़ेसर मैनेजर पांडेय साहित्य का समाजशास्त्र पढ़ाते हुए बताते थे कि किस तरह राजस्थान में कुछ कक्षाओं में उन्हें नागमती का विरह वर्णनऔर इन पंक्तियों का अर्थ समझाने में दिक्कत आती थी। महानगरों में रहने वाले जिन्होंने केवल फ़िल्मों गीतों में सावन-भादो में नायिकाओं को भींगते देखा है उन्हें कभी-कभी मिथिला और अवध के गाँवों को भी अपनी यात्रा में शामिल करना चाहिए। किस तरह से किसानों का जीवन स्याह मेघ और उमड़ते-घुमड़ते बादल की मौजों पर टिका रहता है। कैसे फूस के घर की छावन की चिंता उन्हें सताती रहती है, जिनके घर के पुरुष दिल्ली और पंजाब में मजदूरी कर रहे हैं।

(किताब मे शामिल लेख-सावन का संगीत का एक अंश)

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