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| पत्रकार और फिल्म निर्देशक, अविनाश दास |
मेरे बड़े भाई के ससुराली कनेक्शन वाले इन हमउम्र साले से मेरी दोस्ती हो गयी,
क्योंकि हमारे बीच साहित्य कॉमन फैक्टर था।
शिक्षा की औपचारिक और सघन धारा से मैं डीरेल हो गया, लेकिन अरविंद दास लीक पर बने रहे। उन्होंने उच्च शिक्षा
हासिल की। शोध वाला मिज़ाज बनाया। गंभीर पत्रकार बने, तो हमारा मज़ाक़ वाला रिश्ता ख़त्म हो गया, ईर्ष्या वाला ज़्यादा बन गया कि काश मैं भी
अरविंद दास हो पाता।
हम मिलते रहे, बातें करते रहे।
मुझे ख़ुशी हुई जब पिछली बार उन्होंने अपनी किताब "हिंदी में समाचार" के
विमोचन समारोह में मुझे आमंत्रित किया। उनकी नयी किताब अनुज्ञा प्रकाशन से आयी है,
बेख़ुदी में खोया शहर [एक पत्रकार के नोट्स]।
काश कि इसके विमोचन समारोह में भी शामिल हो पाता, लेकिन दिल्ली-बदर होने और मुंबई में दिहाड़ी की मजबूरी के
चलते ऐसा नहीं हो पाएगा। मैं अरविंद जी को मुबारकबाद देता हूं, शुभकामनाएं देता हूं। उनकी हर कामयाबी के साथ
हमारा मान बढ़ता है।



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