अरविंद जी, नमस्कार.
माफ़ कीजिएगा, समय नहीं निकाल पाया। वैसे पुस्तक तो ख़रीदने के बाद तुरंत ही पढ़ लिया था। पर कुछ लिखने के लिए समय नहीं निकाल पा रहा था। वैसे इस पुस्तक पर बातें होती रहेगी क्योंकि इसमें बात करने लायक़ काफ़ी 'समिधा' है।
मैं ऑस्कर वाइल्ड का एक उद्धरण का सहारा लूँगा कि ‘पुस्तकें अच्छी या बुरी नहीं होती हैं। वे या तो अच्छी लिखी होती हैं या बुरी लिखी होती हैं।’ आपकी पुस्तक ‘बेख़ुदी में खोया शहर’ बिलकुल ऑस्कर वाइल्ड की इस उक्ति पर खड़ी उतरती है। निश्चित रूप से आपकी पुस्तक बहुत ही अच्छी लिखी गई पुस्तक की श्रेणी में आता है।
इस पुस्तक में अपने लेखन से आप एक ऐसे संवेदनशील लेखक के रूप में सामने आते हैं जो अपने आसपास बहुत ही बारीकी नज़र रखता है। आपने लेखन की अपनी शैली विकसित की है और यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। मैं कोई पुस्तक उठाऊँ बिना यह जाने कि इसे किसने लिखी है, और मेरे मुँह से यह निकल जाए कि लेखन शैली से यह तो अरविंद जी की पुस्तक लगती है, तो मुझे लगता है यह बड़ी बात है। दूसरों की तो बात नहीं, पर मेरे लिए यह सच है कि मैं एक विशिष्ट शैली इसमें देख रहा हूँ।
किसी लेखक की लेखकीय प्रतिभा का बहुआयामी होना शायद उसको कालातीत बनाता है। मुझे आपमें बहुत आयाम दिख रहे हैं। ज़ाहिर है कि आपका पत्रकारीय प्रशिक्षण और दृष्टि आपके लेखन को एक बड़ा canvas देने में मदद कर रहा है। पर इस तरह का प्रशिक्षण होने के बाद भी हर व्यक्ति इस तरह से लिख ले यह भी ज़रूरी नहीं है। इसलिए व्यक्तिगत प्रतिभा की भूमिका को नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता।
पुस्तक में कई जगह, जिसे हम sweeping statement कहते हैं, मुझे देखने को मिला। एक शोधकर्ता शायद ऐसा कभी न करे पर पत्रकार के रूप में हम और आप सब इस तरह की स्वतंत्रता लेते रहते हैं। और अरविंद जी, आपको यह दोनों ही लाभ मिल रहा है!
वैसे अपनी पुस्तक में आपने एक जगह ज़िक्र तो किया है, आपके साथ मैं भी, आपके अन्य शुभचिंतकों की तरह, आपके उपन्यास/कहानी की बाट जोहेंगे।
मेरी प्रशंसा का बुरा नहीं मानिएगा। पर मैं यह पूरी ईमानदारी से कर रहा हूँ। सिर्फ़ प्रशंसा करने के लिए प्रशंसा नहीं कर रहा हूँ।
हम ज़्यादा मिलें, ये मेरी इच्छा है।
अनेकानेक शुभेच्छा के साथ
अशोक


